किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए हमें जिस शक्ति की जरूरत पड़ती है वह है आत्मविश्वास की शक्ति ।  इसी शक्ति की वजह से सफलता मिलती है लेकिन कभी- कभी ऐसा भी वक्त आता है जब  किस्मत के आगे व्यक्ति लाचार और बेबस खड़ा रह जाता  हैं । इसी पर आधारित है मेरी आज की कहानी  !  जिसका शीर्षक है 👇


      




दिसंबर की सर्द हवा बेरोक-टोक बहती  ही जा रही हैं ।  सायं - सायं की आवाज कानों में मंदिर के घंटों से भी तेज सुनाई पड़ रही है ।  मैं सुनंदा प्रताप सिंह ! तेज कदमों से आर्मी बेस कैम्प की तरफ बढ़ती ही जा रही हूॅं । मेरे कंधों पर पड़ी शाॅल के  दोनों सिरों को  हवा बड़े ही नियमित तरीके से  मेरी विपरीत दिशा में लगातार उड़ाए लिए ही  जा रही हैं । 

मैं तो ऐसे ही आ रही थी , वो तो मेरी पोती श्यामली जों अभी महज सात वर्ष की है  ने मुझे जबरदस्ती  डाॅंटते हुए यह शाॅल ओढ़ा दी थी । मैं ‌भी उसकी हर एक बात ऐसे मान जाती हूॅं  जैसे  वह मेरी माॅं हों । मेरी पोती !  मेरे बेटे की प्रतिछाया । पिछले सात महीनों  से उसे देखकर ही तो मैं जी रही हूॅं  वर्ना मुझे सुध ही कहाॅं रहती  है आजकल  ?  

मैं सुनसान सड़क पर लगातार बढ़ती ही जा रही हूॅं  । कानों में तो संतरी द्वारा कही गई बातें ही गूॅंज रही है।  छः महीने पच्चीस दिन  से मैं  सिर्फ और सिर्फ  आज के दिन का ही  तो बेसब्री से इंतजार कर रही थी । इन छः महीने चौबीस दिनों में ऐसा कोई भी दिन नही बीता जब मैं अपने शहर स्थित आर्मी बेस कैम्प में नहीं गई । छः महीने तेईस दिनों तक तों मुझे एक ही जवाब मिलता रहा कि अभी तक दुश्मन मुल्क ने हमारे देश के बंधक जवानों को छोड़ने की मंजूरी नहीं दी गई है , वैसे हमारी सरकार दुश्मन मुल्क पर दवाब बना रही है और उम्मीद है हमें इसमें कामयाबी भी मिल जाएं और हमारे बंधक  जवान सकुशल अपने वतन लौट आएं । सकुशल शब्द सुनते ही मन में बेचैनी बढ़ने लगी  ?  मेरे बेटे ने आज से दस साल पहले मेरे लाख मना करने के बावजूद भी आर्मी ज्वाइन कर ही ली थी । ऐसा नहीं है कि मुझे अपने देश से प्रेम नहीं लेकिन सच्चाई तो यह है कि मुझे अपनी मातृभूमि से प्रेम तों है लेकिन अपने बेटे से अधिक नहीं । एक माॅं हूॅं ना ! अपने बेटे को अपनी जिंदगी  से दूर जाते नहीं देखा जाएगा मुझसे । मैं इतनी मजबूत नहीं कि दुबारा वही घाव वक्त मुझे दें और मैं चुपचाप ऑंसू बहाती रहूं । नहीं .. नहीं ... इस बार नहीं ! 

रोज की तरह कल भी मन में उम्मीद और आत्मविश्वास का चोला पहन मैं नियत समय से आर्मी बेस कैम्प पहुॅंची । मेन गेट पर ड्यूटी कर रहे  संतरी ने मुझे दूर से ही शायद देख लिया था तभी तो उसने मुस्कुरा कर और ऑंखों में चमक लिए मुझे " नमस्ते माॅंजी "  कहा था । बाकी  दिन तों उसके चेहरे  की मुस्कुराहट और ऑंखो की चमक गायब ही रहती थी लेकिन आज ऐसा क्या हुआ कि यह संतरी मुझे देख कर इतना खुश हो रहा है , कहीं सरकार की दवाब वाली बात काम तों नहीं कर गई ? । 

सोच ही रही थी कि संतरी ने फिर से कहा  " कल  बहुत खुशी का दिन आने वाला है माॅंजी ।  हमें तों आज ही मालूम हुआ वो क्या है ना माॅंजी ! हम ठहरे मामूली सिपाही , हमें बड़े - बड़े अफसरों के बीच की बातें थोड़ी  देर से ही पता चलती हैं । बात यह है कि  कल  तड़के ही पड़ोसी मुल्क द्वारा हमारे देश के बंधक जवान को रिहा कर दिया जाएगा । कल शाम तक हमारे जवानों को इसी  आर्मी बेस कैम्प में  लाया जाएगा और आप देखो ! कल की ही तैयारियां चल रही है और तों और  उन जवानों से मिलने यहाॅं के मुख्यमंत्री भी तो कल यहाॅं आने वाले है ।" 

वह संतरी थोड़ी देर चुप रहा और मेरी तरफ देखकर ना जाने क्या सोचता रहा ? उसने मुझे संतरी पोस्ट के पास रखी कुर्सी पर पहले तों बिठाया और दौड़ कर मेरे लिए एक गिलास पानी लें आया । उसने पानी का गिलास  मेरी तरफ बढ़ाया लेकिन मैंने मना कर दिया ।  मुझे तो अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि वह सच कह रहा है । मैं भगवान से यही प्रार्थना कर रही थी कि उसकी कही बातें कल सत्य साबित हो और मैं अपने जिगर के टुकड़े को   इतने दिनों बाद गले लगा सकूं । 

उसकी कही बातों से  मैं आत्ममंथन के पाताल से निकल कर धरातल पर आ गई । वह संतरी मुझसे  कह रहा था 
" आपकी  इतने दिनों की  तपस्या सफल हुई माॅंजी ! आज  आपके आत्मविश्वास की जीत हुई है । आप हमेशा से कहती आ रही है कि आपका लाल़ ( बेटा ) अपने देश वापस लौट कर जरूर आएगा और देखिए ! आपके आत्मविश्वास और तपस्या का ही फल है कि कल शाम आप अपने बेटे से मिल सकती है ।" 

संतरी की बातें सुन  मेरी ऑंखों के कोरों में छलक आए ऑंसू मेरी गालों पर लुढ़क आएं । छः महीने तेईस दिनों से  मन को जों पीड़ा हों रही थी , वह ऑंखो के रास्ते निकलने को बेताब थें । आज तक जिन ऑंसूओं को मैंने अपनी ऑंखों में कैद कर रखा था , वह बेतरतीब बह रहें थे और मैं उन्हें रोक नहीं रही थी क्योंकि यह खुशी के ऑंसू थें । वह ऑंसू जो  मेरे  बेटे की वतन वापसी की खबर सुनकर  मेरी ऑंखों में आएं थे । 

कल आर्मी बेस कैम्प से लौटते हुए मेरे पांव जमीं पर पड़ ही नहीं रहें थे । खुशियों की उड़ान को ऐसे पर ( पंख ) लगें कि मन मयूर नाच उठा । होंठ गुनगुनाने लगे , चेहरे पर अद्वितीय आभा का एहसास मुझे स्वयं होने लगा । 

घर आई तो पोती श्यामली आते ही लिपट गई । रोते हुए कहने लगी " दादी ! आप ही मम्मी को जाकर समझाओं ।  वह  तो दिन भर सोई  रहती  है , मेरे साथ खेलती  भी  नहीं  । ना ही मुझे पढ़ाती है और ना ही मुझसे बात  करती है । दिन भर रोती रहती है , आज भी आपके जाने के बाद रो ही रही थी । मैं उनके पास उन्हें चुप कराने गई तों उन्होंने दोनों हाथों से मुझे अपने सीने से लगा लिया और जोर - जोर से रोने लगी । मैंने पूछा भी कि मम्मी आपको क्या हुआ ?   लेकिन उन्होंने मुझे कुछ नहीं बताया । वह अभी भी रो रही है ।  उनका रोना देख मुझे भी रोना आने लगता है ।"  यह कहकर वह भी रोने लगी । 

मैंने उस नन्ही परी के ऑंखों से बूंदों की तरह टपकते ऑंसू को अपनी साड़ी की ऑंचल के  कोर से पोंछा और उसे पुचकारते हुए कहा " कल के बाद से तुम्हारी मम्मी ना तो बिस्तर पर ही रहेगी और ना ही हर समय रोती ही रहेगी क्योंकि कल के बाद हम चारों  की जिंदगी जो छः महीने से दुखों और ऑंसूओं के साथ कट रही थी , उन दिनों का समापन होगा और हमारे सुख के दिन फिर से  लौट कर वापस  आएंगे और ‌हाॅं ! अभी हम - तुम  तुम्हारी मम्मी के पास चलते हैं और जाकर यह खुशखबरी सुनाते है कि कल शाम तुम्हारे पापा घर वापस आएंगे ।" 

हुर्रे .. कल पापा घर आएंगे ‌... कल पापा घर आएंगे .. कहते हुए मेरी पोती श्यामली ताली बजाते - बजाते गोल - गोल घूमने लगी । उसकी मम्मी जिसने दादी - पोती की बातें सुन ली थी , वह भी दीवार के सहारे आहिस्ते-आहिस्ते चलकर हमारे पास पहुॅंच चुकी थी ।   पति के वियोग ने एक पत्नी को छ: महीनों में  मानव कंकाल  बना दिया था ।   दरवाजे पर खड़ी वह मानव कंकाल  मेरी बहू , मेरे बेटे की पत्नी और मेरी पोती की माॅं  थी जिसके चेहरे पर छ: महीने बाद मैं खुशी देख रही थी । 

मैं अब आर्मी बेस कैम्प में पहुंच चुकी हूॅं । चारों तरफ लाल और पीले फ्लेग से पूरा कैंप सज रखा हैं । मुझे वेटिंग रूम में बिठा दिया गया है क्योंकि मैं समय से पहले ही आ गई हूॅं । बेटे से मिलने की तड़प ने अंधा कर दिया और मैं घड़ी देखने के बावजूद भी दोपहर में ही यहां आ गई हूॅं ।  मानसपटल के पीछे बैठी स्मृतियां आज उछल - उछल कर बाहर आने को बेताब हो रही हैं । यह स्मृतियां ऑंखों के सामने चलचित्र की भांति  सामने आ रही हैं । 


मेरे पति  मेजर वीर प्रताप सिंह , एक रौबदार चेहरा ..  बड़ी - बड़ी ऑंखें .. चाल में ऐसा रूआब कि किसी भी दुश्मन का दिल दहला जाएं , ऐसा आकर्षक व्यक्तित्व की हर कोई एक बार मुड़कर देखने को विवश हो जाएं । आवाज़ ऐसी की दोस्तों को मिस्री की तरह मिठास की अनुभूति करा दें और दुश्मनों ‌की डर से रूह तक काॅंप जाएं । 

अपनी देश के प्रति  ईमानदारी और बहादुरी का सबूत मेजर साहब ने  उस समय दिया जब देश को इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी  । युद्ध के समय सच्चा देशभक्त सैनिक ना तों दुश्मनों की गोली से ही डरता है और ना ही पीठ दिखाकर वापस ही लौटता है । वह तों अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने सीने पर गोलियां खाता है और अपनी अंतिम सांस तक दुश्मनों  से  लड़ता ही रहता है । मेजर वीर प्रताप सिंह मातृभूमि के ऐसे लालों में शुमार थे जिन्होंने अकेले अपने दम पर दुश्मनों के इलाके में जाकर उनको मात दी  थी और अपने देश का तिरंगा उनके कब्जे किए हुए इलाकों पर जाकर लहराया था और अंत में मातृभूमि का यह वीर और जाबांज सपूत मातृभूमि की ही गोद में सर रखकर हमेशा के लिए सो गया था । 

मेजर  वीर प्रताप सिंह , आज भी आर्मी बेस कैम्प में उनकी बहादुरी के किस्से ट्रेनिंग करने आएं नौजवान लड़कों को उनके  ट्रेंड  करने वाले ऑफिसर सुनाते रहते  हैं ।  

हर एक फौजी की यही तमन्ना होती हैं कि वह अपने देश के काम आएं , चाहें इसके लिए उन्हें अपने प्राणों का ही बलिदान क्यों ना देना  पड़े ? और उसकी इस दुनियां से विदाई तिरंगे में लिपटकर हों । मेजर वीर प्रताप सिंह की भी  यह तमन्ना पूरी हुई  और वह मुझे एवं अपने चौदह साल के बेटे आदित्य वीर प्रताप सिंह  को रोता - बिलखता छोड़  इस जहां और हमारी जिंदगी से रूखसत हों गए । 

समय गतिमान होता हैं , यह किसी के लिए कहां रूकता है ?  मैं अब मेजर साहब की विधवा ‌थी । मेरे जीने की वजह मेरा बेटा था जिसे मैंने फौज से दूर रखने की लाख कोशिश की लेकिन मेरे बेटे की रगों में बहते देशभक्ति खून ने समय के साथ उबाल भरना शुरू कर दिया और एक दिन ऐसा भी आया जब उसने अपने पिता की तरह ही आर्मी ज्वाइन कर ली । पिता और बेटे के देशभक्ति खून ने माॅं के ऑंसूओं को  पराजित कर दिया और  मैं कुछ ना कर सकी । 

बेटे ने अनेकों उदाहरण देकर मुझे  समझाया  ।  वह मुझे तो समझा गया लेकिन एक माॅं के डर और चिंता को वह नहीं समझा पाया । मैं रोज ही ईश्वर से उसकी सलामती की दुआ माॅंगने लगी । ईश्वर ने मेरी सुनी भी । मैंने धूमधाम से उसकी शादी उसकी ही पसंद की लड़की से कराई । अपने बेटे - बहू को खुश देखकर मुझे सारे जहां की खुशी मिल जाती थी । मेरी खुशी दोगुनी ‌हो गई ‌जब एक साल बाद ही मेरी पोती श्यामली हमारे  छोटे - से उपवन की बगिया में अंकूर बनकर अंकुरित हुई । 

मैंने सब-कुछ देख लिया था और अब  सिर्फ एक ही तमन्ना थी कि बेटे के सामने  इस दुनियां से रूखसत हों जाऊं लेकिन ईश्वर ने तो मेरे लिए कुछ और ही सोच रखा था । आदित्य के छुट्टी काटकर जाने के एक महीने बाद ही पड़ोसी मुल्क से जंग शुरू हो गई जिसमें आदित्य को भी जाना था । जाने से पहले उसने मुझे फोन किया था । मैं उस वक्त स्वार्थी हो गई थी । करती भी क्या ?  अपने पति को तों ऐसे ही एक जंग में खो चुकी थी , अब अपने बेटे को नहीं खोना चाहती थी । मैंने उसे कायरों की तरह फौज छोड़ कर अपने पास बुलाने का भी प्रयत्न किया लेकिन वह अपने पिता की भांति ही सच्चा देशभक्त था । उसने मुझसे वादा किया कि वह वापस मेरे पास  जरूर लौट कर आएगा । 

मेरे बेटे ने अपना किया वादा पूरा किया और वह कुछ घंटे बाद  वापस आ रहा है । इस खबर ने मेरी ऑंखों से नींद चुरा ली थी तभी तों कल रात मैं सो ही नहीं पाई थी मुझे  शाम होने  का इंतजार है , जब मैं अपने बेटे से मिलूंगी । 

शाम हो गई है , अब मेरा बेटा आ गया होगा । यह बुदबुदाते हुए मैं वेटिंग रूम से बाहर निकल आई हूॅं । यह क्या ? यहां तों सभी जवान खड़े हैं । आई . जी . साहब कुछ बोल रहे है लेकिन मुझे उससे क्या ? मुझे तो अपने बेटे की एक झलक देखनी है । वह दिख क्यों नहीं रहा ? 
सभी  की वर्दी और कैप एक जैसी है तभी तों इस बूढ़ी और कमजोर हो चुकी ऑंखो को साफ - साफ कुछ दिख नहीं रहा है । चश्मा उतारकर पोंछ लेती हूॅं , शायद ! ऑंखो की नमी से धुंधला दिखाई दे रहा हों ? 

चश्मा भी पोंछ लिया फिर भी मैं अपने बेटे को नहीं देख पा रही । यह कैसे हो सकता है कि एक माॅं अपने बच्चे को देख ही ना पाएं ।  ' हे ईश्वर ! मुझे मेरे बेटे से मिला दो ' बारम्बार यह  प्रार्थना ईश्वर से मैं करती रही ।

कार्यक्रम खत्म हुआ तो मन में आशा जगी कि जब मेरा बेटा मुझे यहाॅं खड़ा देखेगा तों जरूर मेरे पास आएगा । कुछ देर बाद ही अपने बेटे को अपनी तरफ आते हुए देख मेरा दिल खुशी से झूम उठा । वह जैसे - जैसे नजदीक आ रहा था , मेरी ऑंखों की चमक बढ़ती जा रही थी । जब वह मेरे पास आकर रूका मैंने उसे गले लगा लिया । 

माॅंजी ... माॅंजी .. सुनते ही मैंने आवाज़ की तरफ देखा । कल वाला संतरी ही खड़ा था । मैंने उससे खुश होकर कहा " देख बेटे ! मेरा बेटा वापस आ गया । इसने मुझसे कहा था कि यह वापस लौट कर जरूर आएगा ।" 

' माॅंजी यह आपका बेटा नहीं है , यह तों उसका दोस्त सरफराज  है । इसे भी  आपके बेटे की तरह ही दुश्मन मुल्क ने बंदी बना लिया था ।'  संतरी ने मेरी तरफ देख कर कहा । 

सरफराज ने बोलना शुरू करता है । शब्द उसके मुॅंह से बाहर निकलते है । यें शब्द छोटी-छोटी आकृतियां और आकार धारण कर लेते हैं ।‌ जिसमें मुझे अपने बेटे , सरफराज और दुश्मन मुल्क के मेजर की आकृतियां दिखाई देने लगती हैं । शत्रु मेजर आदित्य और सरफराज को मार - पीट रहा है । अपने बेटे को पीटता देख मेरा शरीर लहुलुहान हो रहा है । वह शत्रु हमारे देश को गाली देने लगता है । सरफराज और आदित्य को गुस्सा आ रहा हैं । गाली देने के बाद आदित्य ने  जो तिरंगा अपने साथ लाया हुआ है उसे उछालकर वह शत्रु मेजर फेंकने ही वाला होता है कि आदित्या जख्मी होते हुए भी उसके हाथ से तिरंगा छीन उसके हाथ  को इस कदर पकड़ कर मरोड़ने लगता  है कि उस शत्रु मेजर की चीखें आकाश मेंअ गुंजायमान होने लगती हैं ।  अपने मेजर की यह हालत देखकर पास खड़े सैनिक आदित्य पर गोलियों की बौछार शुरू कर देते हैं । आदित्य जमीन पर पीठ के बल गिरता है और तिरंगा उसके सीने और शरीर पर फैल जाता है । 

सरफराज बोलना बंद कर देता है क्योंकि शब्द मर चुके है और साथ ही आदित्य वीर प्रताप सिंह भी । सभी की आकृतियां धीरे - धीरे ऑंखो के सामने से ओझल हो रहीं हैं । मेरी ऑंखें भी बंद हो रही है । मैं अपने बेटे से मिलने  के लिए तड़प रही हूॅं । मेरे चारों तरफ मुझे अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा है । मैं आदी ... आदी करती उन  अंधेरों में ही भागती जा रही हूॅं । रास्ते टेढ़े-मेढ़े , उबड़-खाबड़ हैं लेकिन मुझे इसकी परवाह नहीं । इन्हें पार कर आगे बढ़ने पर  धुआं ही धुआं हैं । अचानक से  आदी मुझे दिख रहा है । अपने बेटे को देखकर मैं प्रफुल्लित हो रही हूॅं । आदी धीरे - धीरे दबे पांव मेरे पास आ रहा है । मेरा मन कहे रहा है कि उसके पांव में कुछ तकलीफ़ हैं लेकिन उसके चेहरे पर गर्व की लालिमा मुझे दिख रही है । मैं दौड़कर उसके  गले लग जाती हूॅं । हम दोनों की ऑंखो से ऑंसूओं की बरसात हो रही हैं । 

अपनी माॅं को छोड़कर कहाॅं चला गया था बेटा  ? मैं  आदी से पूछ रही हूॅं और वह मुस्करा रहा है । 

माॅं ! मैं जहां आ गया हूॅं वहां से मेरी वतन  वापसी नामुमकिन है लेकिन मुझे अपने आप पर गर्व है कि मैं इस जहां से विदा तो हो गया लेकिन मैंने अपने देश की शान  तिरंगे पर कोई आंच नही आने दी और  तिरंगे का अपमान करने वाले को मैंने  मुॅंहतोड़ जवाब  देते  हुए मृत्युदंड  दिया । माॅं ! जैसे आपने मुझे आज तक संभाला है वैसे ही आज से  मेरी बेटी श्यामली और अपनी बहू  को आपको ही  संभालना है । उनका सबल बन आपको एक और देशभक्त तैयार करना है । 

कुछ क्षण बाद मेरी आत्मा के दरवाजे से यह स्मृतियां बाहर निकल चुकी है लेकिन इन स्मृतियों ने मुझे जीने की वजह दें दी थी । मैं अब जहाॅं  हूॅं  वहाॅं अब कुछ नहीं है , ना तो अंधेरा हैं , ना ही उबड़-खाबड़ रास्तें और ना ही कही कोई धुआं । है तो केवल साफ - सपाट उजाला और उन उजालों के पीछे मेरे जीने की वजह । 


                                             धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻


" गुॅंजन कमल " 💗💞💓