बचपन भगवान की दी हुई सबसे खूबसूरत कृति है। बचपन में बच्चे सभी को बहुत प्यारे लगते है। अल्हड़, मासूम सी हंसी सबको बहुत प्यारी लगती है और अक्सर बचपन को याद करके हम आज भी खुश हो जाते हैं और खुशी से आंखें नम हो जाती हैं। बचपन में धूल मिट्टी में खेलना, शरारतें करना, मां का डांटना, फिर प्यार से मनाना आज भी सबको बहुत याद आता है पर जब हम बच्चे होते हैं तो बड़े होने की जल्दी होती है और जब बड़े हो जाते हैं तो बचपन बहुत याद आता है और दिल कहता है कि कोई लौटा  दे वो प्यारे प्यारे दिन। परंतु हमारे बचपन की यादें और बचपन सब हमारे बच्चे लौटा कर ले आते है। जब परिवार में बच्चे का जन्म होता है तो घर के सभी लोग उसमें अपनी छवि ढूंढने लगते हैं और उसके साथ उन सभी ख्वाबों को फिर से जीने लगते हैं। वह मासूमियत, वह नटखट मुस्कान से सब को सताना। वह बचपन भी क्या कमाल होता है जिसमें बच्चे परियों की कहानी सुनकर आसानी से सो जाया करते थे। बहुत कमाल थे वह दिन भी जब कभी मम्मी की गोद में, तो कभी पापा के कंधे, कहीं भी सो जाते कहीं भी चढ़ जाते कुदते फांदते सारा घर सर पर उठा लेते और कोई कुछ भी ना कहा पाता क्योंकि सब उस प्यारी सी मुस्कान के दीवाने थे। इतने अच्छे होते थे वह दिन तब दिल नहीं सिर्फ खिलौने टूटा करते थे, ना पैसे की सोच, ना लाइफ के फंडे, ना कल की चिंता और ना फ्यूचर के सपने। रोने के बहाने भी ना थे और ना हंसने की वजह। जहां चाहा हंस लेते थे और जहां रो लिया करते थे। ना कुछ पाने की आशा ना कुछ खोने का डर। बस अपनी धुन और अपने सपनों का घर, गुड़िया गुड्डे, खेल खिलौने, बस इसी में बीत जाता है पूरा बचपन और पता ही नहीं चलता कब बड़े हो जाते हैं यह बच्चे और खत्म हो जाता है बचपना। पर फिर भी किसी खिलखिलाते बच्चे को देखकर हमेशा मन प्रफुल्लित हो उठता है।

प्रिया धामा