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असर है तेरी चाहत का मुझपे
या बदलते मौसम का दिल पे खुमार है
रोके नहीं रूकती है अहसास दिलो में
क्या करू जो बढ़ता ही जारहा ये प्यार बेशुमार है

सोचती हूँ तुम्हे एक पल के लिए देखु ना
लेकिन दूसरे ही पल दिल तड़प जाता है
चैन नहीं मिलता आँखों को ज़ब तक देख न लु तुम्हे
क्या करू जो बढ़ता ही जारहा है ये प्यार बेशुमार है

बहुत समझाती हूँ दिल को पर ये मेरी नहीं सुनता
होश नही रहता इसे ख्यालो तेरे मुझे भी भूल जाता है
लेती हूँ जो साँसे मैं उसपे भी सिर्फ नाम लिखा है तेरे
क्या करू जो बढ़ता ही जारहा है ये प्यार बेशुमार है

जल उठता है दिल मेरा जो तुझे हवा भी छूकर गुजरे
जी करता है रोक लिया करू बादल को जो तुम्हे भिगो जाता है
जीना मुश्किल कर रही है ये दिल में बसी चाहत तेरी
क्या करू जो बढ़ता ही जारहा है ये प्यार बेशुमार है

तुम तो नहीं पढ़ते कभी जो लिखती हूँ शायरी नाम तेरे
तेरे सिवा इस जहाँ के हर कोई पढ़के पिघल जाते है
कभी तू भी पढ़ लिया कर लफ़्ज़ इस नैना की है गुजारिश 
क्या करू जो बढ़ता ही जारहा है ये प्यार बेशुमार है...!!
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नैना....✍️✍️

(काल्पनिक....)