कितना भी छुपाओ पर दिखेगा चेहरा
एक न एक दिन वो घूंघट हटा ही देगी
चाहे कितना भी लगाओ झूठ का पहरा
(2)
सिमट कर एक कोने में बैठी है वो
तुम्हारी आंखों की वहशत से डरती हुई
झूठ के संग रचाते हो रोज रासलीला
क्या सच्चाई की दुल्हन से बनती नहीं?
संगीता शर्मा" प्रिया"

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