' कान्हा ! तुम भी तो काले थे और इसलिए तुम्हारा नाम कृष्ण है । मेरी दादी ने मुझे बचपन में बताया था कि  कृष्ण का संस्कृत में अर्थ काला या श्याम होता हैं क्योंकि इस रंग में ब्रह्मांड के सारे रंग समाहित होते हैं इसलिए इस  रंग को सर्ववर्ण  माना जाता है लेकिन मेरे लिए यही रंग मेरी बदकिस्मती का कारण बनी हुई है । कोई मुझे प्यार नही करता । मेरी माॅं और मेरे पिता ने भी मेरे इसी रंग के कारण मेरा साथ छोड़ दिया था । बाकी भाई - बहन गोरे थे इसलिए सब उन्हें ही प्यार करते थे । बचपन से ही मेरे इस रंग के कारण मुझे हर किसी ने  उपेक्षित किया । घर में एक दादी ही थी जिन्होंने मुझे हर तिरस्कार के बाद अपने सीने से लगाया । मुझे तुम्हारे बारे में और तुम्हारे रंग के बारे में बताकर मेरा मन बहलाती रही । दादी के कारण ही मुझे शिक्षा रूपी ज्ञान और पिता समान ससुर मिलें  वर्ना मुझे यहाॅं  कौन पसंद करता है ? 
सासू माॅं को भी अपने गोरे वर्ण का गुरूर है तो मेरे पति भी उन्हीं के समान रूप के सौंदर्य को ही प्राथमिकता देते हैं । उन दोनों के समक्ष मन और गुणों  की सुंदरता गौण है । मुझे अपने  ससुराल वालों ने अपने ही  घर में एक नौकरानी से अधिक कुछ नहीं समझा है । मेरी शादी को छः महीने होने को आएं हैं लेकिन मेरी सासू माॅं ने ना तो मुझे कभी भी अपनी बहू का दर्जा दिया है और ना ही मेरे पति ने मुझे अपनी पत्नी ही स्वीकार किया है । मैंने इन छः महीनों में  सब-कुछ करके देख लिया लेकिन इनका दिल नही जीत पाई । मैं क्या करूं कान्हा ? मैं क्या करूं ????...... '   सलोनी ने रोते हुए भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने अपने शीश को झुकाते हुए कहा । 

' भगवान के सामने यूं माथा पटकने से कुछ नहीं होने वाला । जैसे तुम्हारे रंग को देखकर तुम्हारे खुद के माता-पिता ने तुम्हें छोड़ दिया था वैसे ही भगवान ने भी तुम्हारा साथ छोड़ दिया है । किस्मत तो मेरी फूटी है जिसमें तुम जैसी काली नागिन अपना फन फैलाए बैठ गई है । छः महीने से पापा की वजह से रोज तुम्हारी काली सूरत देखनी पड़ती है । अगर पापा के वचन से मैं बंधा हुआ नहीं होता तो कब का तुम्हें छोड़कर दूसरी शादी कर चुका होता । पापा कब तक हमारे साथ रहेंगे ? ज्यादा से ज्यादा पाॅंच साल । उनकी बीमारी ही ऐसी है कि यह पाॅंच साल भी उनके लिए बहुत है । सोचों ! जब पापा ही नहीं होंगे तो उनको दिया वचन मेरे लिए कुछ भी मायने रखेगा क्या ?   एक पत्थर की मूर्ति के सामने सिर पटकने से कुछ नहीं होने वाला। जा जाकर मेरे लिए पाॅंच मिनट के अंदर चाय - नाश्ता लेकर आ । अगर ऐसा नहीं हुआ तो तुझे मालूम है तेरे साथ मैं कैसा व्यवहार करूंगा ?'       सूरज ने हॅंसकर कहा । 

छः महीने पहले सूरज और सलोनी की शादी हुई थी जो कि सूरज के पापा ने सलोनी के व्यवहार और उसके गुणों को देखते हुए कराई थी । सूरज के पिता को अपने घर में एक गृह लक्ष्मी चाहिए थी जो कि उनकी पत्नी कभी भी नहीं बन पाई थी । जब भी वह थके-हारे घर आतें उनकी पत्नी किटी पार्टी में या तों गई रहती या फिर घर पर ही हों रहें किटी पार्टी में व्यस्त रहती । अपने पति के लिए वक्त ही नहीं होता था सूरज की माॅं के पास । सूरज की भी देखभाल बचपन से ही नौकर ही करते आएं थे । यही वजह थी कि सूरज के पिता ने अपने नालायक और आवारा बेटे के लिए सलोनी जैसी गुणी लड़की का चयन किया था और अपने बेटे के सामने शर्त रखी थी उसे अगर इस घर और पूरी जायदाद का मालिक बनना है तो उनके द्वारा चुनी गई लड़की से ही उसे शादी करनी होगी । सूरज से वचन लेकर उन्होंने सलोनी और सूरज की शादी तो करा दी थी लेकिन सलोनी को अब तक उसका हक नहीं दिलवा पाएं थे । 

' आज की हमारी मुख्य अतिथि है हमारे जिले की पहली महिला जिलाधिकारी " सलोनी सूरज सिंह " । 
इनका तालियों के साथ हम सभी जोरदार अभिनंदन करते हैं ।'  सोशल एंड एजुकेशनल सोसायटी की अध्यक्षा ने अपने जिले की पहली महिला डीएम सलोनी सूरज सिंह की तरफ देखते हुए कहा। 

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच डीएम सलोनी का अंगवस्त्र ओढ़ाकर अभिनंदन किया गया । जिलाधिकारी सलोनी ने अपना हाथ जोड़ते हुए सबका अभिवादन स्वीकार किया और जिले के विकास कार्यों में अपना पूरा सहयोग करने की बात कही । लोगों से मुखातिब होने के बाद सलोनी अपनी कुर्सी पर बैठने ही वाली थी कि उसका पैर मुड़ा और वह गिरने ही वाली थी कि उसके पति सूरज ने अपनी शक्तिशाली बांहों में उसे इस तरह थाम लिया जैसे एक प्रेमी अपनी प्रेमिका को संभाल रहा हो । अपने पति की बांहों में बेपनाह मुहब्बत देखकर सलोनी के होंठो पर मुस्कान बिखरने लगती है और वह शरमा कर अपनी ऑंखें मूॅंद लेती है । 

' अरे ओ महारानी ! नींद में मुस्कुराएं ही जा रही हो । ऐसा कौन सा ख्याब देख लिया कि मुस्कुराहट होंठों से हट ही नहीं रही , गोंद की तरह चिपक गई है ।' 
सूरज ने जोर से सलोनी को कहा । 


सलोनी ने सूरज की आवाज सुनी तो हड़बड़ाकर अपनी ऑंखें खोली । सामने सूरज तो था लेकिन वह उसकी बांहों में नहीं बल्कि जमीन पर लगें अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी । 

' मेरी सुबह की काॅफी कहाॅं है ?' सूरज ने गुस्से में सलोनी से कहा । 

' मैं अभी लाती हूॅं ।'  कहते हुए सलोनी जल्दी से उठी और अपने बिस्तर को समेटने लगी । बिस्तर समेटते देखकर सूरज ने एक बार फिर से सलोनी को टोकते हुए कहा " यहाॅं सभी को मालूम है कि मेरे दिल और मेरी जिंदगी में तुम्हारा क्या स्थान है इसलिए यह सब ड्रामा छोड़ो कि किसी को पता चल जाएगा कि तुम मेरे साथ बिस्तर पर नहीं बल्कि जमीन पर सोती हो । जाओ और जल्दी से मेरे लिए ब्लैक काॅफी लेकर आओ । 

' जी ।' सलोनी इतना ही बोल पाई क्योंकि ऑंसू उसकी पलकों से गिरने के लिए बेताब थे और इन ऑंसूओं को वह ऐसे व्यक्ति को नहीं दिखाना चाहती थी जिसके दिल में उसके लिए प्यार और सम्मान हो ही नहीं । वह लगभग दौड़ते हुए कमरे से बाहर चली आई । 

कमरे के बाहर ही सलोनी के पिता खड़े थे । अपनी बेटी समान बहू की ऑंखो से बहते ऑंसू को देखकर वह समझ गए कि यह ऑंसू उनके  सपूत  की ही देन है । उन्होंने अपनी बहू के सिर पर स्नेह रूपी एक हाथ रखा और दूसरे हाथ से उसके ऑंसू पोंछते हुए उसे चुप हो जाने का इशारा किया । 

सलोनी चुप हो गई । उसने अपने ससुर की तरफ देखते हुए कहा  " पापा ! आज मैंने एक ख्वाब देखा , जिसे मुझे पूरा करना ही है और इस देखे गए ख्वाब को पूरा करने में आपको मेरी मदद करनी है ।" 
यह कहने के बाद उसने अपने ससुर से आज देखे गए ख्वाब के बारे में विस्तार पूर्वक बता दिया । 

एक बार फिर से सलोनी भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति के पास खड़ी थी और उन्हें रास्ता दिखाने के लिए धन्यवाद दें रही थी । उसने जो आज सुबह ख्वाब देखा था उसे पूरा करने का दृढनिश्चय वह भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति के समक्ष कर चुकी थी । सलोनी के साथ ही उसके ससुर भी भगवान श्रीकृष्ण के सामने हाथ जोड़कर खड़े थे और उन्होंने भी प्रण किया था कि अपनी बहू को संघ लोक सेवा आयोग ( U P S C ) की परीक्षा पास करवा कर भारत प्रशासनिक सेवा अधिकारी ( I A S ) बनवा कर ही दम लेंगे ताकि सलोनी को इस घर में ही नहीं बल्कि पूरे देश में मान - सम्मान मिल सकें । 

                                            धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻

" गुॅंजन कमल " 💗💞💓