रंगोली बचपन से ही बहुत अच्छी लगती थी प्यारी सी सुंदर सी भोली सी बच्ची मां के हर काम को बड़े ध्यान से देखती और करने की कोशिश करती हर त्यौहार पर मां की देखी देखा रंगोली भी बनाती मां हमेशा उसे समझाती 
'देख बेटा अपनी पढ़ाई पर ध्यान दें नहीं तो इन्हीं कामों में अटकी रहेगी"
पर उसे तो रंगों से खेलना पसंद था मां की बातें कहां सुनाई देती थी ढेर सारे रंग लेकर बैठ जाती कभी हाथों के छापे बनाती तो कभी उंगलियों से चित्र बनाती सभी पसंद करते पर मां को चिंता थी कि पढ़ना ज्यादा जरूरी है इसलिए उसे बार-बार बोलती रंगोली थोड़ा पढ़ाई पर ध्यान दें पर उसने बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जब परीक्षाफल आया तो जैसा होना था वही हुआ तीन विषय में फेल रंगोली बहुत ज्यादा डर गई उसने मां को चिट्ठी लिखी
' प्यारी मां बहुत बड़ा वाला सॉरी है मैं तीन विषय में फेल हो गई हूं आप मुझे हॉस्टल मत भेजना मैं मन लगाकर पढ़ाई करूंगी और आपको कोई भी शिकायत का मौका नहीं दूंगी पर साथ में एक रोता चेहरा बनाया एक बड़ा सा डंडा दो कांपते हाथ"
मां के तो पैरों से जमीन निकल गई उसकी आंखों से झर झर आंसू बहने लगे मेरी इतनी सी छोटी बच्ची की मन में इतना भय भरा है कि उसने मुझे चिट्ठी लिखी रोता चेहरा बनाया कापते हाथ और मोटा डंडा बनाया वह चित्र और वह चिट्ठी मां के दिल में गड़ गई उसने रंगोली के सिर पर हाथ फेरा और बोली
'"चिंता मत करो तुम तो बहुत बहादुर हो पढ़ने में भी होशियार हो अच्छे नंबर लाओ गे तो सब कुछ भूल कर पढ़ाई में लग जाओ'"
और रंगोली हंसते मुस्कुराते खिलखिलाते पढ़ाई करने चली गई  
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर