आखिर मुगल बादशाह अकबर का सपना पूर्ण हुआ। लगभग पूरे भारत को अपने अधिकार में लेने पर भी मेबाङ की आजादी उसे बहुत खलती थी। मेबाङ नरेश राणा प्रताप को बहुत प्रतोभन देने का भी फायदा न हुआ। प्रताप को आजादी ज्यादा पसंद थी। लोभ उन्हें छू तक नहीं गया था। आखिर हल्दीघाटी के रण में राणा को हारकर भागना पङा। मेबाङ पर मुगलों का अधिकार था।
अकबर की सोच कुछ यही थी कि केवल राणा की हठधर्मिता के कारण अभी तक मेबाङ आजाद था। वैसे कुछ हद तक यह सही भी था। हर कोई इतना साहसी नहीं होता। हर किसी का इतना आत्मबल नहीं होता। अधिकांश सुविधा भोगी होते हैं। बेइज्जती होने पर भी सोने की थाली में परोसा भोजन मिलने में अपना बङप्पन समझते हैं। मेबाङ में सुबिधाओं की घोषणा की जा रही थी। जनता को आश्वासन दिया जा रहा था कि मुगलों के शासन में वह उन्नति होगी जो आजाद मेबाङ के लिये स्वप्न ही था। मुगल कोई आतातायी नहीं हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में उनका अधिकार है। कहीं की जनता को कोई परेशानी नहीं है। बादशाह अकबर खुद अमन और चैन की मिसाल हैं। हिंदुओं को उन्होंने बहुत सम्मान दिया है। उनकी सलाह समिति में बीरबल और टोडरमल जैसे विद्वान हैं। तानसेन जैसे महान गायक पर उनका समर्थन है। एक ओर दरबारी अब्दुल रहीम खानखाना को तो मुस्लिम कहना ही बेकार है। अबुल फजल बादशाह के आश्रय में ही श्रीमद्भगवद्गीता और रामायण का उर्दू में अनुवाद कर चुके हैं।
पर अकबर ने जो सोचा वह नहीं हो पा रहा था। अभी भी अधिकांश गांवों में उसके सैनिकों का विरोध हो जाता। अकबर की कूटनीति थी कि जनता का दमन न किया जाये। और जनता के नाम पर बस औरतें, बच्चे और बूढे ही बचे थे। ज्यादातर तो हल्दीघाटी के आजादी समर में अपने प्राणों की आहुति दे चुके थे।
मेबाङ के एक गांव में बस औरतें और बच्चे ही रह गये। फिर भी मुगल सैनिकों को देख महिलाएं तलवार उठाकर सामना करने को तैयार थीं। सभी अपने पति और जवान बच्चों को खो चुकीं थीं। फिर भी आजादी के यज्ञ के आहुति देने को स्त्रियां तैयार थीं। स्त्रियों से उलझने में कोई फायदा न था। फिर भी गांव से निकलने के मार्ग पर मुगल सैनिकों का पहरा था। बिना युद्ध मानसिक दबाव बनाकर गुलाम बनाने का प्रयास किया जा रहा था।
दस साल का बालक दुद्धा बहुत बदलाव देख रहा था। उसकी माता और चाची दोनों अब सफेद साङी पहनतीं थीं। काफी समय से पिता और चाचा को उसने देखा नहीं था। वैसे राजपूत बच्चों को महीनों पिता को न देखने की आदत थी। अब अक्सर माता की आंखों में आंसू दिख जाते।
अब दो बार की बजाय एक बार खाना मिलता। गांव की सारी स्त्रियां जिनमें उसकी माता और चाची भी थीं, नियमित तलवारबाजी का अभ्यास करतीं। धनुष से तीर चलातीं। अलग अलग कठोर प्रशिक्षण जारी था। आजादी का यज्ञ कुछ समय के लिये रुक भले गया हो पर कभी भी शुरु हो सकता है। राणा को कमी नहीं महसूस होने दी जायेगी। पुरुष न सही पर गांव की महिलाएं एक बार फिर आजादी के यज्ञ में आहुति देंगी। इस बार अपने प्राणों की आहुति देकर भी मेबाङ की आजादी लेनी है।
पर कहीं राणा खुद विचलित तो नहीं हो रहे। कहीं खुद को अकेला महसूस तो नहीं कर रहे। सुना है कि अरावली की पहाड़ियों में आसरा बनाया है। पता नहीं, खाना भी समय पर मिलता है या नहीं। फिर भी मनोबल कमजोर नहीं होना चाहिये। राणा के पास संदेश भेजना है। सच भी है कि पीठ थपथपाने मात्र से किसी के भी मन में उत्साह पैदा होता है। राणा को अपने समर्थकों का पता लगना चाहिये।
दस साल के दुद्धा की जो समझ, कह नहीं सकते। आखिर बजह क्या थी, इस पर वाद-विवाद करने पर अच्छी चर्चा हो जाये। कुछ लङके की नासमझी भी बतायें। पर एक रोज दुद्धा अपनी दोनों रोटियां लेकर चुपचाप निकल गया। राणा को संदेश देने का जिम्मा चुपचाप अपने कंधों पर उठाकर कमीज की जेब में रोटियां रखे चुपचाप गांव की सीमा से बाहर निकल गया। महिलाएं अस्त्र शस्त्रों के अभ्यास में व्यस्त थीं। अनुमान भी न था कि दस साल का लङका कुछ इस तरह सोच सकता है।
गांव से निकलने के मार्ग पर सिपाहियों को देख खेतों के रास्ते चलने लगा। सिपाहियों को लङके में ज्यादा दिलचस्पी न थी। फिर भी एक सीपाही ने दूर से भाला फेक दिया। लङके के बांये कंधे को जख्मी कर भाला गिर पङा। लङके के मुख से चीख निकल पङी।
दुद्धा भागा जा रहा था। राणा को संदेश देना है। आज की रोटी भी छिपाकर लाया है। राणा को पता नहीं, कब से खाना नहीं मिला। सामने आराबली की पहाड़ियों को देख आबाज लगाने लगा - "राणा। आजादी का यज्ञ चलाते रहना। प्राणों की आहुति देने में अभी स्त्रियां भी पीछे नहीं हैं। यज्ञ चलता रहे। मेबाङ आजाद हो। जीवन तो नश्वर है। यश ही असली जीवन है। क्षत्रियों का यश तो रण भूमि में प्राण त्यागना है। फिर आजादी के लिये प्राण अर्पण करना तो प्रभु की आराधना है। "
दावा नहीं करते कि दुद्धा को इन बातों का अर्थ भी पता हो। कई दिनों से महिलाओं को संदेश बनाते और सुनाते सुना था। ऐसे के ऐसा याद कर लिया। संभव है कि कुछ बातें दुद्धा भूल गया हो। फिर भी जितना याद था, बोलता रहा। अंत में थककर गिर गया।
काफी देर बाद दुद्धा को होश आया। राणा और उनके सैनिक दुद्धा का उपचार कर रहे थे। सलामती की दुआएं की जा रही थीं। दुद्धा को आंखें खोलते देख राणा को खुशी हुई पर यह खुशी थोङी देर की थी। दीपक बुझने से पुर्व एक बार तेज जलता है। दुद्धा ने एक बार फिर अपने गांव की महिलाओं का संदेश राणा को सुनाया। छिपाकर लायी रोटियां राणा को देकर दुद्धा की आंखें हमेशा के लिये बंद हो गयीं। आजादी के यज्ञ में दस साल के लङके ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। राणा के मन में आजादी का जुनून जिंदा रखने बाले दुद्धा की मृत्यु पर राणा की आंखें गीली हो रहीं थीं।
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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