वर्षा ऋतु की एक अंधेरी रात में जब आकाश में यदा कदा बिजली भी कौंध रही थी एक सुंदरी किस तरह अपने प्रेमी से मिलने जाती है ,उसी का वर्णन है।




कृष्णमयी यामिनी
तड़ित तड़ित दामिनी
अभिसार को जा रही
अवगुंठित कामिनी

मेघ भी घिरे हुए
जब तब बरस रहे
मुख चन्द्र पर गिरे 
कुंतल सम्भालती 
जा रही भामिनी

पंक मे पड़े जो पग
धूसरित हुये सब वस्त्र 
उत्तरीय सम्भालती
मंथर गति जा रही
दुःखितमना मानिनी

क्रोध से हृदय कम्प
कैसे हो तुम कन्त
भयभीत कर रही
चंचल चपला चपल
कैसे रहूँ मैं अविकल

क्यों बैठे हो निष्ठुर बन
अब तो आजा  ओ मोहन
कड़क कड़क डरा रही
राधा को तेरी सौदामिनी

कृष्णमयी यामिनी
तड़ित तड़ित दामिनी
अभिसार को जा रही
अवगुंठित कामिनी।


रेनु सिंह
स्वरचित