तुमसे मिलना अच्छा लगता है!
           हे प्रकृति! विधाता की तुम सुंदर कृति हो!
यह धरती,यह आकाश, यह  पर्वत और यह  सागर!
यह वन- उपवन , यह जीव-जंतु और कलकल बहती यह सरिता!
तुझे विधाता ने कितना विलक्षण बनाया है !
   तुमसे मिलना अच्छा लगता है!

     हे धरती! तुम कितनी प्यारी हो!
सबकी जननी तुम, सबका पोषण करती हो!
अपने अंक से लगाकर सबकी रक्षा करती हो!
धन-धान्य, कनक,गृह देती; तुम सबकी ही माता हो!
      तुमसे मिलना अच्छा लगता है!

हे आकाश!  तुम अनंत हो !
निस्सीम व्योम हो तुम; तुझमें ही,
बादल ,पवन , इन्द्रधनु ,सुमेरु ज्योति,
सूरज,चंदा , ग्रह- नक्षत्र ; हैं  निक्षिप्त सभी!
   तुमसे मिलना अच्छा लगता है!

हे पर्वत! तुम कितने ऊँचे, कितने महान हो!
सुमेरु, हिमालय और कैलाश कितने रूप तुम धरते हो!
कैलाश तुम शिव के धाम हो, हिमालय तुम गिरिजा के पिता!
गोवर्धन गिरि तुम कान्हा के प्यारे, तुझको कृष्ण ने तर्जनी पर धारा!
     तुमसे मिलना अच्छा लगता है!

  हे सागर ! गहरे अनंत ;अनगिनत रहस्यों के तुम खान हो!
सप्त समुद्र बनकर  ,सृष्टि के तुम आधार बने हो!
लवण ,दधि,  मदिरा, इक्षु, घृत,  क्षीर , मीठे जल का सागर रूप ले,
सप्तद्वीप का आलिंगन कर सृष्टि के अनुपम रहस्य बने हो!
      तुमसे मिलना अच्छा लगता है!

वन-उपवन तुम कितने न्यारे!रूप अनगिनत तेरे हैं !
स्वर्ग में नंदन वन तुम हो, वृन्दावन में कदंब वन हो!
लता कुंज तरु सरोवर से मंडित,
असंख्य पुष्प,फल शोभित ;पंछी के कलरव से गुंजित हो!
    तुमसे मिलना अच्छा लगता है!

हे कलकल बहनेवाली सरिता!
आदिकाल से तुम बहती आई।
सुरसरिता गंगा तुम ही हो;यमुना, गोदावरी ,सरस्वती!
नर्मदा ,सिंधु, कावेरी; तुम अति पुण्य सलिला हो!
तुमसे मिलना अच्छा लगता है!

हे  सृष्टि के सकल जीव चराचर !
तुम विधाता की सुंदर रचना हो!
पिपीलिका से ब्रह्म पर्यंत तुम सबमें,
वह परमात्मा भासित होता है!
   तुमसे मिलना अच्छा लगता है!

हे सृष्टि के मूलाधार! 
अनादि ,अनंत तुम सर्वव्याप्त हो!
जल,थल, नभ और अनंत व्योम के ,
कण-कण में तुम व्याप्त हो!
    तुमसे मिलना अच्छा लगता है!
- पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर "
(यह मेरी मौलिक रचना है। सर्वाधिकार सुरक्षित ।)
(मुखचित्र गूगल से साभार)
तुमसे मिलना अच्छा लगता है!
           हे प्रकृति! विधाता की तुम सुंदर कृति हो!
यह धरती,यह आकाश, यह  पर्वत और यह  सागर!
यह वन- उपवन , यह जीव-जंतु और कलकल बहती यह सरिता!
तुझे विधाता ने कितना विलक्षण बनाया है !
   तुमसे मिलना अच्छा लगता है!

     हे धरती! तुम कितनी प्यारी हो!
सबकी जननी तुम, सबका पोषण करती हो!
अपने अंक से लगाकर सबकी रक्षा करती हो!
धन-धान्य, कनक,गृह देती; तुम सबकी ही माता हो!
      तुमसे मिलना अच्छा लगता है!

हे आकाश!  तुम अनंत हो !
निस्सीम व्योम हो तुम; तुझमें ही,
बादल ,पवन , इन्द्रधनु ,सुमेरु ज्योति,
सूरज,चंदा , ग्रह- नक्षत्र ; हैं  निक्षिप्त सभी!
   तुमसे मिलना अच्छा लगता है!

हे पर्वत! तुम कितने ऊँचे, कितने महान हो!
सुमेरु, हिमालय और कैलाश कितने रूप तुम धरते हो!
कैलाश तुम शिव के धाम हो, हिमालय तुम गिरिजा के पिता!
गोवर्धन गिरि तुम कान्हा के प्यारे, तुझको कृष्ण ने तर्जनी पर धारा!
     तुमसे मिलना अच्छा लगता है!

  हे सागर ! गहरे अनंत ;अनगिनत रहस्यों के तुम खान हो!
सप्त समुद्र बनकर  ,सृष्टि के तुम आधार बने हो!
लवण ,दधि,  मदिरा, इक्षु, घृत,  क्षीर , मीठे जल का सागर रूप ले,
सप्तद्वीप का आलिंगन कर सृष्टि के अनुपम रहस्य बने हो!
      तुमसे मिलना अच्छा लगता है!

वन-उपवन तुम कितने न्यारे!रूप अनगिनत तेरे हैं !
स्वर्ग में नंदन वन तुम हो, वृन्दावन में कदंब वन हो!
लता कुंज तरु सरोवर से मंडित,
असंख्य पुष्प,फल शोभित ;पंछी के कलरव से गुंजित हो!
    तुमसे मिलना अच्छा लगता है!

हे कलकल बहनेवाली सरिता!
आदिकाल से तुम बहती आई।
सुरसरिता गंगा तुम ही हो;यमुना, गोदावरी ,सरस्वती!
नर्मदा ,सिंधु, कावेरी; तुम अति पुण्य सलिला हो!
तुमसे मिलना अच्छा लगता है!

हे  सृष्टि के सकल जीव चराचर !
तुम विधाता की सुंदर रचना हो!
पिपीलिका से ब्रह्म पर्यंत तुम सबमें,
वह परमात्मा भासित होता है!
   तुमसे मिलना अच्छा लगता है!

हे सृष्टि के मूलाधार! 
अनादि ,अनंत तुम सर्वव्याप्त हो!
जल,थल, नभ और अनंत व्योम के ,
कण-कण में तुम व्याप्त हो!
    तुमसे मिलना अच्छा लगता है!



- पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर "
(यह मेरी मौलिक रचना है। सर्वाधिकार सुरक्षित ।)
(मुखचित्र गूगल से साभार)