राजा सत्यव्रत आज फिर से बहुत नाराज थे। वैसे कुमार सुबाहु पर उनका असीम प्रेम था। पर बार बार उनकी एक ही शिकायत को भला कब तक नजरंदाज किया जा सकता है। कुमार भविष्य के राजा होंगें । उनका देश के लिये कुछ कर्त्तव्य है। उन्हें देश के लिये जीना और मरना सीखना होगा। शूरवीरों की जननी रही सौराष्ट्र देश का भविष्य ऐसे राजकुमार के हाथों में जा सकता है जिसे शस्त्र विद्या में कोई भी रुचि नहीं है। राजा को अक्सर रणभूमि में आगे बढकर अपनी सेना का नैत्रत्व करना होता है। राजा का साथ ही सैनिकों के मन में वीरता जगा देता है। यदि राजा ही कमजोर हो तो फिर सेना का मनोबल भी गिर जाता है।
आज फिर से गुरुकुल से राजकुमार की शिकायत आयी।
" महाराज। राजकुमार गणित के अच्छे ज्ञाता हैं। ज्योतिषि में उनकी बहुत रुचि है। साहित्य के प्रकांड पंडित हैं। अनेकों ललित कलाओं के जानकार हैं। शास्त्रार्थ में उनको गहन रुचि है। अन्तर गुरुकुलीय शास्त्रार्थ प्रतियोगिता में अपने राज्य का प्रतिनिधित्व कर राज्य को गौरव दिला चुके हैं। उनके इतने सारे गुण भी उनके एक अवगुण के सामने छोटे हो रहे हैं। गुरुओं के प्रयासों में कोई कमी नहीं है। अनेकों बार समझाने के बाद भी राजकुमार सुबाहु शस्त्र विद्या का अभ्यास नहीं करते हैं। न तो उन्हें तलवार चलाना आता है। न ही धनुष से लक्ष्य भेद करना। दूसरे अन्य हथियारों से भी वह सर्वदा दूर ही रहते हैं।
यद्यपि राजकुमारों की मुख्य शिक्षा ही शस्त्र शिक्षा है। पर राजकुमार कौमार्यावस्था के आरंभ तक भी उससे अनभिज्ञ हैं। ऐसी स्थिति में महाराज को ही कुछ आवश्यक कदम उठाना होगा। राजकुमार को समझाना होगा। अन्यथा देश के भविष्य के लिये किसी अन्य विकल्प पर भी विचार करना होगा। "
राजकुमार के विषय में ऐसे पत्र पहले भी गुरुकुल से प्राप्त होते रहे हैं। पर आज गुरुदेव ने पत्र में स्पष्ट कर दिया कि देश के भविष्य के लिये महाराज को कुछ अन्य विकल्प भी तलाशना हो सकता है। यही महाराज की चिंता का मुख्य विषय था। इस चिंता का कोई समाधान वह समझ नहीं पाये। जिसकी परिणति महाराज के क्रोध के रूप में थी। आखरी बार महाराज राजकुमार सुबाहु को समझाने के लिये चल दिये। वह जानते थे कि शायद इस बार भी कोई अच्छा परिणाम नहीं मिलेगा। शायद अब देश के भविष्य के लिये कुछ अन्य सोचने का अवसर आ पहुंचा है। शायद अब वह समय आ पहुंचा है कि एक राजा को अपना राजधर्म निभाने के लिये पिता से ऊपर सोचना होगा।
ईश्वर चाहें तो कुछ भी असंभव असंभव नहीं रहता। संभव है कि राजकुमार सुबाहु अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो जायें। अभी उनकी आयु भी मात्र पंद्रह वर्ष है। यदि गहराई से शस्त्रों का अभ्यास करें तो शायद अभी भी असंभव संभव हो सकता है। दुख की बात एक और थी। इस समय राज्य पर एक और संकट की घड़ी आ पहुंची थी। हालांकि उस संकट का आरंभ भी शायद उसी समय हो चुका था जबकि राजकुमार सुबाहु का जन्म हुआ था। पर किसी तरह से महाराज अपनी उद्यमशीलता से राज्य को उस संकट से बचाये हुए थे। पर अब उनकी सामर्थ्य की सीमा भी समाप्त हो रही थी। देश और विदेशों से भी विद्वानों को बुलाया जा रहा था। कोई तो धरती पर होगा जो सौराष्ट्र को आगामी संकट से बचा सके।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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