जीवन में अनेकों बार ऐसे पल आते हैं कि जो कमजोर दिखता है, वह अचानक मजबूत बन जाता है। जिसका सर हमेशा आदेश गृहण करने की मुद्रा में झुका रहना है, वह खुद आदेश देने लगता है। हमेशा फटकार खाने बाला भी कभी ऐसी स्थिति में आ जाता है कि वह एक ही बार में पूरे अपने मन की कर ले। पर क्या वास्तव में कोई केवल बदला लेने के लिये ही ऐसा करता है। अनेकों बार नहीं। अनेकों बार बात कुछ ज्यादा गहन हो जाती है। फिर शक्तिशाली, आयु और पद में श्रेष्ठ का साहस भी प्रतिउत्तर देने का नहीं होता है। जब बात देश के हित की हो तो राज्य का एक साधारण नागरिक भी राज्य के शासक की नीतियों की आलोचना कर सकता है।
अभी तक राजकुमार सुबाहु एक अपराध बोध की स्थिति में जी रहे थे। राजकुमार होते हुए भी राजकुमार की भांति कर्तव्य न निभा पाने की ग्लानि से दग्ध थे। पर राज्य में हो रही मुनादी को सुनकर स्थिति बदल गयी। आज उन्हें अपने पिता पर उससे भी ज्यादा क्रोध आ रहा था, जितना कि उस दिन पिता ने व्यक्त किया था। आंखों की भ्रकुटियाॅ तन गयी। चेहरे पर कुछ लालिमा सी छाने लगी। राजकुमार उसी क्षण गुरुकुल से निकल लिये। राजमहल पहुंचने की उन्हें ज्यादा जल्दी थी।
हर बार की तरह राजकुमार ने न तो इस बार महाराज को प्रणाम किया और न कुछ कुशल पूछी। राजकुमार क्षत्रिय गुणों से हीन रहेगा। हथियारों का अज्ञानी रहेगा। यह तो महाराज जानते थे। पर राजकुमार इस तरह अविनयी बन जायेगा। इस तरह संस्कारहीन बन जायेगा। ऐसी कल्पना भी कभी महाराज ने नहीं की थी। अभी तो ईश्वर न जाने कैसी कैसी परीक्षा ले रहे हैं। इस पुत्र की प्राप्ति के लिये प्रजा के साथ धोखा किया। पर जिसकी चाहत में वह पाप किया था, लगता है कि वह इच्छा भी पूर्ण नहीं होगी। ऐसे अविनयी पुत्र भला क्या जीते जी सुख देंगें। क्या मृत्यु के बाद पिंड और जल देंगें। पर यह निश्चित ही इसका दोष नहीं है। यह मेरे ही पापों का परिणाम है।
" राजकुमार। यह तुम्हारी कैसी अविनय है। पिता और गुरु हमेशा हित चाहते हैं। इसलिये अनेकों बार कठोर भी बनते हैं। पर लगता है कि तुम इतने बड़े अभागे हों जो इस सत्य को भी समझ नहीं सकते।"
महाराज सत्यव्रत ने आखरी बार राजकुमार सुबाहु को फटकार दिया। उन्हें अनुमान नहीं था कि जब राजकुमार अपना मुंह खोलेंगें तो फिर उनका मुख बंद हो जायेगा। फिर उनकी आंखों से जो अश्रु निकलेंगे, उस विषय में यह भी नहीं कहा जा सकता है कि वे पुत्र मोह में निकले हैं या फिर उसके गौरव गान में।
" महाराज। यह सब क्या है। सौराष्ट्र नरेश अपने कर्तव्य को भूल रहे हैं। हमेशा आगे बढकर प्रजा की रक्षा करने बाले सौराष्ट्र नरेश आज मोह में अपने कर्तव्य को भूल रहे हैं। अपने पुत्र को अनेकों उपदेश देने बाले सौराष्ट्र नरेश खुद अपने कर्तव्य को समझ नहीं रहे हैं। प्रजा में मुनादी करा रहे हैं कि सौराष्ट्र के लिये जीवन दाव पर लगाने बाला बस एक युवक चाहिये। पर एक युवक तो खुद महाराज के घर में भी है। भले ही वह अस्त्र शस्त्रों के विषय अज्ञानी हो, पर अपने कर्तव्य से विमुख तो कभी नहीं। महाराज। राजकुमार सुबाहु भले ही कमजोर हो पर किसी भी रणभूमि में पीछे तो नहीं रहेगा। इस समय अपने कर्तव्य को आप भूल रहे हैं। राजकुमार से रणभूमि में नैत्रत्व की आशा रखने की बात आपकी झूठी है। वह केवल एक दिखावा था। सौराष्ट्र को इस समय जिस युवा की आवश्यकता है, वह और कोई नहीं, खुद मैं हूं । मेरा अविनय क्षमा करें। मुझे क्रोध बस इसी बात पर आया कि इतना सुगम उपाय होने पर भी सौराष्ट्र की प्रजा को इतने वर्षों तक कठिनाई झेलनी पड़ी। राजा तो हमेशा प्रजा के लिये ही जीते हैं। अब सौराष्ट्र आगे अकाल की पीड़ा नहीं झेलेगा। यदि प्रजा के लिये अपने प्राणों को दाव पर लगाना भी रणभूमि में प्राण अर्पित करने के समान है तो इस रणभूमि में मैं ही अपने प्राण अर्पित करूंगा। "
राजकुमार ने महाराज के चरण छूए। महाराज की आंखों से गंगा जमुना बहने लगी। भाग्य बदलने के बाद भी वही स्थिति आ पहुंची। पर मुनि का यह कथन तो सत्य नहीं कि राजकुमार क्षत्रिय गुणों से हीन रहेगा। नहीं यह तो कदापि सत्य नहीं। रणभूमि में प्राण अर्पित करने बाले राजकुमार को शहीद माना जाता है। उसकी पूजा की जाती है। राजकुमार सुबाहु आज खुद शहादत की राह पर जा रहे हैं। यह तो निश्चित ही क्षत्रिय का लक्षण है। सच बात है कि राजकुमार सुबाहु सच्चे क्षत्रिय हैं। एक सच्चे राजकुमार हैं जो कि सौराष्ट्र के लिये अपने प्राणों को भी दाव पर लगाने को तैयार हैं।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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