आज भी याद है वो दिन
जून की भरी दोपहरी थी,
बस अड्डे पर इक्का दुक्का सवारी
बस का इंतजार कर रही थी।
छाया में बैठने के लिए
मैंने इधर उधर नजर दौड़ाई,
नीम के पेड़ के नीचे
एक औरत नजर आई।
अधपके बाल सांवला रंग
चेहरे की बनावट से आदिवासी लगती थी,
दूसरों के सहारे पानी पीने की उम्र में
आते-जाते पथिकों को पानी पिला रही थी।
देख कर ये दृश्य मन मेरा भर आया
विस्लरी की बोतल को मैंने बैग में सरकाया।
पास जाकर देखा तो दृश्य और गहरा पाया
जूते चप्पल सिलने का भी उसने था जिम्मा उठाया।
पास खड़े देखकर बिन कहे ही उसने
इक टूट सा डिब्बा बढ़ाया,
पानी लिया और "काकी क्या यहां बैठ सकती हूँ" कहा
तो बिन देखे ही उसने हा में सिर हिलाया।
"जमाने मे इंसान कैसे बदल जाते है,
बृद्ध माँ-बाप को ठोकरें खाने को छोड़ देते है"
छोटे से सवाल ने अन्तरहृदय उसका हिला दिया,
फिर मुस्करा कर देखा मेरी तरफ ध्यान लक्ष्य से हटा लिया।
"कैसे बताऊं तुझे पापी पेट का सवाल है,
ये सब दो वक्त की रोटी का कमाल है।
औलाद की सताई नही मैं जमाने की हूँ सताई,
फिर उसने अपनी बाढ़ के प्रकोप की पूरी कहानी थी सुनाई।
परिवार और दौलत सब बाढ़ में बह गई,
और मैं जमाने की ठोकरे खाने के लिए रह गयी।
पाने के लिए मदद को जिस किसी के सामने हाथ बढ़ाया,
उसने ही मेरे जिस्म जान को गिद्ध की तरह नोंक खाया।
और थक हार कर मैंने ये काम अपनाया,
अब यहां बुरी नियत वाले नही प्यासे लोग आते है,
और दरिंदगी नही सहानभूति दिखलाते है।
बन गयी आदिवासी मैं अब निडर होकर जीती हूँ,
क्योंकि अब मैं एक औरत नही पानी पिलाने वाली बुढ़िया जो हूँ।
शीला द्विवेदी "अक्षरा"

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