लुप्त हो रहा है धीरे धीरे
अनमोल पानी का खजाना
अमृत जैसे शीतल जल में
रेंग रहे हैं स्वार्थ के  कीड़े
प्लास्टिक से श्रृंगार कर रहे
अपशिष्टों से उदर भर रहे
फैक्टरी का काला पानी
को अब है नदियों में जाना
लुप्त हो रहा धीरे धीरे
अनमोल पानी का खजाना 

सिमट रहा है शुद्ध पेय जल
सीलबंद बोतल में अब तो
नदी, झील, तालाबों में अक्सर
जो पहले मिलता था हमको
पिंजरे में ज्यों कैद हो गया
एक पंछी का ताना बाना
लुप्त हो रहा धीरे धीरे
अनमोल पानी का खजाना

संगीता शर्मा प्रिया