तन्वी ने स्कूल से आकर बैग रखा और वहीं सोफ़े पर बैठ गई। आज उसे गिरीश दिख गया था। वह स्कूल से घर आते हुए सड़क पार कर रही थी रेड लाइट का सिग्लन हो गया था। एक कार के पास एक मासूम सी नन्हीं सी बच्ची चमकती आँखों और मीठे स्वर में कह रही थी -"बाबूजी फूल ले लो न अपनी मैडम जी को दे देना वे बहुत खुश हो जाएंगी। कार के अंदर से चेहरा बाहर निकलते हुए उस आदमी ने बच्चे को झिड़ककर कर कहा-" एकबार कह दिया न मुझे नहीं चाहिए तो जाती क्यों नहीं। बच्ची की चमकती आंखे उदासी में तब्दील हो गईं और वह चली गई। इसी दौरान तन्वी को उस आदमी का चेहरा दिख गया था। अरे!ये तो गिरीश था जो कभी उसका सब कुछ हुआ करता था। उसकी हर शाम गिरीश के साथ बीतती थी।वह हरदम कहता रहता था कि मुझे तुमसे मिलना बहुत अच्छा लगता है। वह उसकी बातों को सुनकर स्वप्निल दुनियाँ में खो जाती थी। लेकिन आदमी को उसकी मनचाही वस्तु मिल जाये ये ज़रूरी तो नहीं। प्यार कभी कभी नहीं अक्सर अधूरा रह जाता है। यही उसके साथ भी हुआ।
तुमसे मिलना बहुत अच्छा लगता है कहने वाले गिरीश ने अपनी राहें बदल ली थीं। उसे बिना बताए अमेरिका चला गया। ये बात उसे उसके दोस्त रमन से पता चली।
वह बहुत दिनों तक अवसाद में रही। बहुत इलाज कराने पर वह सामान्य हो पाई थी।
आज उसे अचानक उस बच्ची को झिड़कते देखकर उसके मन में गिरीश के प्रति जो थोड़ा बहुत कोमल भाव बचा हुआ था खत्म हो गया।वह उठी बाथरूम में जाकर हाथ मुँह धोकर अपने लिए चाय बनाने लगी।

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'