श्रृंगार माँ भारती का हिमालय मुकुट सँवारता है।

सागर भी चरणों में बैठ कर निज पाँव पखारता है।

हवाओं में पुष्प सुरभित तन मन की साँस लगती है।

नदियाँ तेरे हृदय की गल माल हार सज्जितसुशोभित है।

वंदन अराधना नित सूरज, चाँद, तारे हम सब गाते है।

भाव हृदय सुमन अर्पित कर, तेरा निश दिन गुणगान करे।

तेरे आँचल के हम है लाल, हम सच्चे सपूत तेरे बन जाये।

तेरी गोद में ही जन्म लिया, तेरी गोद में ही हम सो जाये।

श्रृंगार तेरा माँ कर जाये, श्रृंगार तेरा माँ कर जाये।