जिंदगी में जब कभी अपने आप को व्यथित पाती हूँ,
मन को शांत करने के लिए एकांत में जाती हूँ।
एकाग्रता के सूत्र में मन को बांध लेती हूँ,
और लम्बी सांस लेकर ओम का उच्चारण करती हूँ।
बतियाने लगती हूँ फिर खुद से ही,
और कोशिश करती हूँ खुद को ही जानने की।
ले लेती हूँ फिर कलम हाथ में
 और फिर शुरू हो जाती है कोशिश कुछ लिखने की।
कोरे वरक पर फिर शुरू हो जाती है सत्य असत्य की कहानी,
और वो कहानी लगने लगती है फिर कुछ जानी पहिचानी।
मन के भाव बाहर आने को आतुर हो उठे,
जो हम कह नही सकते वो पन्नो पर सज़ गए।
एक -एक मोती पिरोकर ज्यों बनती है माला,
पूर्णिमा की रात्रि में ज्यों शशि का उजाला।
ऐसे ही शब्दों के मोती से कविता बन जाती है,
कभी खुद की कभी दूसरों की 
कभी समाज की सच्चाई का आईना दिखाती है।
डूब जाती है कभी कलम इश्क में 
तो हीर रांझा सी कहानी बन जाती है,
तो कभी विरह की धार में बह कर 
राधा मीरा सी दीवानी हो जाती है।
अभिव्यक्ति, कलम और आत्मभाषड़ से बन जाती फिर कविता,
हम नही कह पाते लफ़्जों से वो मौन होकर कह जाती है कविता।।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"