सुमति,अपनी बहू और बेटे के साथ रहती थी। महादेव को गुरु मान कर उनका पूजन किया करती थी।
कहीं भी महादेव का चर्चा, भजन, पूजन होता वो अवश्य जाती।
चाहे उसे उस पूजन में बुलाया जाए या नहीं।

यह बात सुमति की बहू को बिल्कुल पसंद नहीं थी। उसकी सासू मां बिना बुलाए कहीं भी किसी के घर आंगन में जाए।
सुमति की बहू सुशीला रोज़ अपने पति रामू से शिकायत करती।
कहती। आपकी मां दिन भर यहां वहां घूमती रहती है जहां नहीं बुलाया जाता है वहां भी बिना बुलाए चली जाती हैं। मैं यहां दिन भर घर के कामों में उलझी रहती हूं और वो घूमती रहती हैं।
चाहे मैं अकेले ही घर के कामों में काम करते करते मर जाऊं, किसी को कोई फ़िक्र नहीं।

रामू ने कहा। तुम घर में काम करने के लिए अपनी मां को बुला लो और मैं अपनी मां को चारधाम की यात्रा पर भेज देता हूं।
रोज रोज के कलह से कुछ दिनों के लिए शांति मिलेगा।
ऐसा विचार कर वो दोनों सो जाते हैं।
कुछ दिन बाद रामू अपनी मां को लेकर चारधाम यात्रा पर निकल जाते हैं।

मां को तीर्थ स्थल पर पहुंचा रामू घर लौट आता है।
कुछ ही समय घर का वातावरण बदल जाता है।
जहां धूप अगरबत्ती की खुशबू से भक्ति मय वातावरण था वहीं सेंट आ गया।
जहां पूजा पाठ की चर्चा हुआ करते थे।
वही दूसरों के घरों के शिकायत कलह की चर्चाएं होने लगे।
औरों के घरों से मुक़ाबले होने लगे।
ख़र्च बढ़ गए साथ में अहम भी।
घर के साज-सजावट में ही धन खर्च होने लगे।
कुछ ही दिनों में घर में भोजन के लिए भी पैसे नहीं बचते।
फिर उन्होंने खर्च कम करना शुरु किया।
पर मन में जो बात आ चुकी थी उनसे बेहतर दिखना है।
वो उनके सोचने समझने के विवेक पर कब्जा कर लेते हैं।
उस गांव के चोर के मन में आया जरूर इसने कोई खजाना पाया है तभी अचानक से इसके घर में तरक्की हो रही है।
नहीं तो इतने दिनों से तो सामान्य इंसान ही थे अचानक कैसे बदल गए।

रात्री को चोर उनके घर आ हर वस्तु चुरा कर ले गया।
और उस गांव को छोड़कर कहीं और अन्यत्र चले गया।

एक वर्ष बाद सुमति अपने पुत्र का इंतजार करने लगी अब पुत्र आकर घर वापस लेकर जाएगा।
बहुत दिनों बाद भी जब पुत्र नहीं आया तो वो अकेले ही घर के लिए निकल पड़ी।

रास्ते में थक कर सुमति एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने के लिए बैठ गई।
चोर भी उसी वृक्ष के नीचे विश्राम करने के लिए आ गया।
सुमति ने देखा उनके घर की वस्तु इनके पास है वो समझ गई यह चोर मेरे घर में ही चोरी करके आ रहा है।
सुमति कहा मैं रोज शिव चर्चा करने या सुनने के बाद ही भोजन ग्रहण करती हूं।
क्या आप चर्चा करेंगे या सुनेंगे।
चोर ने सोचा मैंने आज तक कभी कोई पुन्य नहीं किया।
फिर आज मौका है तो मेरा क्या जाता है मैं तो यही हूं।
चोर ने कहा हां अवश्य आप करें मैं सुन रहा हूं।
सुमति ने शिव चर्चा आरंभ किया। और समापन के साथ ही चोर के मन में गलती का आभास हो गया।
और वो सुमति के चरणों में गिर कर माफी मांगने लगा और कहता है मां मैं एक चोर हूं।
मेरे गांव में रामू नाम के साहूकार के घर चोरी करके आ रहा हूं।
आप के द्वारा सुनाई चर्चा को सुनकर मेरे मन में यह आया मैं ग़लत हूं। मैं धन वापस करके महादेव के चरणों में खुद को समर्पित करना चाहता हूं।
सुमति ने कहा तुम मेरे घर चलो मुझे घर छोड़ कर तुम साहूकार के घर चले जाना।
चोर और साहूकार जब घर पहुंचे तो देखते हैं।
बहू बेटा का रो रो कर बूरा हाल है।
मां को देख कर बहू और बेटा दौर कर मां के चरणों में गिर कर माफी मांगने लगे और उन्होंने देखा चोरी के सामान के साथ एक इंसान खड़ा है। उन्होंने सोचा जरूर मां के साथ ही महादेव के दूत चोर से मेरा सामान बचा कर लाए हैं।

दोनों ने अपनी गलती को मानते हुए इस बात को स्वीकार किया मां के कारण ही महादेव के कृपा से सब कुछ वापस आ गया है।

फिर उन्होंने निश्चय किया वो हर सोमवार को महादेव का चर्चा करेंगे और मां को कहीं भी आने-जाने से नहीं रोकेंगे।।
जय शिव शंकर👏

              अम्बिका झा ✍️