बात उन दिनों की है जब मैं स्कूल में पढ़ा करती थी ।शायद दसवीं या ग्यारहवीं क्लास में थी ।स्कूल आते -जाते बस दो ही चीजों को देखने का शौक था।एक दुकानों के होर्डिंग्स और दूसरा पास से गुजरते लोगों को ।माँ हमेशा डांटती रहती ।कहती थीं - लोगों को क्या देखती रहती है,कभी किसी ने इस घूरन कार्यक्रम के लिये झगड़ा किया तो ?
और मैं हँस कर कह देती -कुछ नही होगा माँ बस मुझे अच्छा लगता है।हर डांट फ़टकार के बावज़ूद ये मुझसे छूटता ही नहीं था ।ऐसे ही घूरते ,देखते अचानक उनको देखा ।एक औरत लबादा ओढ़े चली जा रही थी।भीड़ से अलग ।बड़ी उत्सुकता हुई ।सिर से पाँव तक ढकी सिर्फ आँखें ही दिख रही थी ।ऐसी ड्रेस ।अचानक याद आया ,जानती थी मुस्लिम औरतें घर से बाहर निकलते वक्त बुर्क़ा पहनती हैं ।
यह सिर्फ एक ड्रेस ही नहीं था मेरे लिए ,एक रहस्यमयी सी चीज थी ।हर रोज उन्हें रास्ते मे देखती और सोचती ,क्यों पहनती है ऐसे कपड़े कितनी चीजें छुपाई होंगी उसके अंदर।तब इतना नहीं सोच पाई थी कि चीजें नहीं खुद को छुपाना उनका मक़सद था ।
अचानक एक दिन वो ठीक सामने आ गईं ।चेहरा तो छुपा हुआ था ही बस कपड़े की जाली से दो आँखें झांक रही थीं ।मन हुआ उन्हें छू कर देखूँ ,हाथ पकड़ कर रोक लूँ और उन आँखो में देखूँ ।पर ऐसा कर न सकी ।फिर तो यह रोज़ का सिलसिला हो गया ।जानबूझ कर उनके सामने जाती और किसी न किसी बहाने जाली के पीछे छिपी आँखो को देखती।वह भी हर दिन मुझे देखती थी ।मुझे देख कर उनके मन में कौन -कौन से विचार आते होंगे ,मुस्कुराती होंगी ,खुश होती होंगी ,गुस्सा करती होंगी पर ऐसे सारे भाव उनके ढके चेहरे पर देखना चाहती थी जो असम्भव था सो उन आँखों को ही पढना शुरू किया।
कुछ महीने बीत गए पर ये सिलसिला खत्म न हुआ। अब तो उनकी आँखे हर बात मुझसे कहने लगी थीं।
उस वक़्त हमारे घर में एक तोता हुआ करता था।पिजरे में बंद दिन भर टॉय-टॉय करता रहता ।जब भी उसे देखती वह टुकुर -टुकुर मेरी ओर देख रहा होता ।उसकी आँखें मुझे उस बुरके वाली की आँखों की याद दिला देता ।दोनों ही जैसे कुछ कह रहे हों।स्पष्ट था दोनों ही कहना चाहते थे निकालो मुझे इस कैद से निकालो ।आजाद करो ।
ऐसी ही कितनी बातें अब ये बंदी आँखे हर रोज़ कहने लगीं।घर आ कर उन संकेतों को समझने की कोशिश करती ।आज उन्होंने क्या कहा होगा ,अपने घरवालों के अविश्वास की दुहाई दी होगी।
आज उन आँखो ने कहा होगा ,अपने आप को छुपा कर अपनी शख्शियत को खो रहे है हम ।
एक दिन उनकी आँखों में सितारे चमक रहे थे मानो कहना चाह रहे हों कि देखो कितने सूंदर कपड़े पहने है मैंने ,या कितनी सूंदर लग रही हूँ मैं।
गीली ऑंखे कभी पूछ रही होतीं क्या हमारा आचरण इस बुरके का मोहताज़ है? हमारा शरीर तो इसमें छुप सकता पर मजबूरी कहाँ छुपेगी ,लहूलुहान होता मन कहाँ छुपेगा ।कभी तो अपनी औरत होने की शर्मिंदगी से भरी होती ऑंखे।
कल तो उन आँखो ने ताना ही दे दिया ...
बस देखती ही रहो कुछ करना नहीं ।
मैं भी उनमें देख कर कहना चाहती थी कि करूँगी जरूर करूँगी ।
बाहर बुरके वाली और घर मे मेरा तोता ,दोनों मुझे चैन से रहने नहीं दे रहे थे ।
एक दिन मैंने तोते का पिंजरा खोल दिया ।लड़खड़ाते पैरों और फड़फड़ाते पंखों से धीरे -धीरे उसे उड़ता देखने लगी और मन ही मन उन सीखचों के पीछे छुपी आँखो से कहने लगी ....
बस अब आगे तुम्हारी बारी !!!!!!
मधुलिका सिन्हा
कोलकाता

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