भूल भुलैया, ग्रहों की,
ये राज़ है, कितना गहरा,
ज्यौं समुद्र की, गहराई!!

ग्रह कितने, सौर मंडल में,
ज्यौं हैं, रेत बालू में कण,
क्या कोई, बता पाया!!

नासा की खोज,
अन्नंत सूर्य, अंतरिक्ष में,
अनगिनत, गैलेक्सी मौजूद!!

चक्कर, लगा रहे ग्रह,
अन्नंत आकाश, तारामंडल,
सूर्य के चहुँ ओर!!

जीवन है, मनुष्य का,
क्यों पड़ें, ग्रह के फेर में,
बना दिया इसको, व्यापार!!

भविष्य अपना, जानते नहीं,
किसी का भाग्य कैसे,
बदल सकते, मालुम नहीं!!

ज्योतिषों का चलता,
षडयंत्र अपना, अंधविश्वास,
फलता फूलता, व्यापार!!

रुढ़िवादिता को छोड़ो,
सोच को अपनी बदलो,
वैज्ञानिकता के धरातल,
को आधार बनाओ!!

कर्म प्रधान है कलयुग,
कर्म अपना करले मानव,
सब दिन शुभ, बुराई में भी, 
छिपी है अच्छाई!!

कर्म से चरित्र,
चरित्र भाग्य विधाता,
मेहनत, विवेक से करो,
अपना भाग्य निर्माण!!

उपदेश हुए बहुतेरे,
अकर्मण्यता को छोड़ो,
जीवन सफ़ल बनाओ!!

     काव्य रचना-रजनी कटारे
          जबलपुर ( म.प्र.)