आदमकद आईने में खुद को ध्यान से देखती हुई स्नेहा रो पड़ी... फूल कर कुप्पा हो गई थी.. कमर कमरा हो गया था और चेहरा कितना ज्यादा नीरस लगने लगा था.. आँखों में चमक भी होती है.. उसकी आँखें देख कोई कह ही नहीं सकता है...आज लता ने उसे देख ये सारी उपमाएं दी हैं.. आज अगर लता अचानक बाजार में नहीं मिली होती तो उसे तो कभी भान भी नहीं होता इन सब बातों का.. पुराने एलबम निकाल कर बैठ गई थी स्नेहा.. देख देख अश्रु धारा बहा रही थी... बेटा जो कि माँ से कुछ कहने आया था.. उल्टे पाँव लौट गया... और बहन को भेजा उसने... उसे भी समझ नहीं आ रहा था कि एलबम में ऐसा क्या देख लिया माँ ने.. समय देख कर पता चला पापा आते होंगे.. वही संभालेंगे... पानी लाकर माँ को देती है पीने और वही बैठ जाती है....
    जैसे ही कॉल बेल बजती है.. दोनों बच्चे भाग कर दरवाजा खोलते हैं.. दोनों के दरवाजा खोलने की गति इतनी द्रुत थी कि स्नेहा के पतिदेव अचंभित होने के साथ साथ अनजानी आशंका से काँप जाते हैं... बेडरूम में झाँक कर देखते हैं तो सोचते हैं.. मायके की याद आई होगी एलबम देखते देखते.. और स्नेहा को मिलवा लाने की बात कहने कमरे में जाते हैं... उनके जाते ही गोली की तरह छूटता प्रश्न पूछा जाता है.. मैं मोटी हो रही हूँ.. तुमने बताया क्यूँ नहीं... हे भगवान.. ये कब हुआ... स्नेहा के पतिदेव बौखलाए...
पहले के कोई कपड़े नहीं आते मुझे.. आँखों में चमक नहीं है मेरी.. मैं बदल गई हूँ.. पहचान में नहीं आती..आज बाजार में लता नहीं मिलती तो मुझे पता भी नहीं चलता.. झूठी तारीफ करते शर्म नहीं आई तुम्हें... अब रोना धोना बंद हो चुका था... बच्चे पापा का विभाग समझ अपने रूम में जा चुके थे...
ओह.. हो ये बात है.. महोदय के समझ में सारी बात आई...
स्नेहा के पतिदेव स्नेह से अपनी अर्धांगिनी को देखते हुए कहते हैं.. कौन से कपड़े नहीं आते.. मैंने तुम्हें पहली बार जिस कपड़े में देखा था.. आते ही हैं..ऐसे क्या देख रही हो.. अभी भी शादी वाली साड़ी तुम्हें आ ही जाती है.. दो आँख.. एक नाक.. एक मुँह अपनी अपनी जगह पर हैं.. बदली कैसे तुम.. जो मैं बताता...हम तुम एक हैं... हमारी दुनिया एक है... उसमें अपने दिल तक मेरी बातों को ही प्रवेश दिया करो...  हम तुम्हारे... तुम हमारे सनम.. और क्या चाहिए.. फिर ज़िंदगी गुलजार है .. थोड़ा रोमांटिक होते हुए महाशय बोलते हैं.. 
तुम्हें तो हमेशा मज़ाक मस्ती सूझती है और मैं लता की बातों से हलकान हुए जा रही थी... आओ जल्दी बाहर चाय बनाती हूँ मैं.. 
स्नेहा के पतिदेव आईना में खुद को देखते हुए सोचते हैं.. बहुत बड़ी ज़ंग जीत लिया मैंने आज तो.. नहीं तो घर निकाला भी मिल सकता था... तोंद तो मेरी भी निकल गई है.. कुछ करना होगा.. सोच उदास भी हो जाते हैं....
आरती झा(स्वरचित व मौलिक)
दिल्ली 
सर्वाधिकार सुरक्षित©®