जाने कहाँ चले गए वो प्यारे प्यारे दिन,
याद बहुत आते हैं वो बीते रुपहले दिन।
वो लापरवाही का आलम , वो मस्ती का मौसम,
वो स्कूल को दौड़के जाना, और वो कॉलिज वाले दिन।
वो सावन के झूले, वो बारिश में जो भीगे,
वो अपना छाता और उसमें दो दो लोगों वाले दिन।
वो सन्तरे की खट्टी गोली, वो चूरन खाती टोली,
वो खेतों में सोने सी पीली खेती, वो गेहूँ वाली वाले दिन।
वो दादी की लंबी कहानी, वो नानी की परियां पुरानी,
वो बुआ , चाचा के सँग धूम मचाना, वो दो छोटी वाले दिन।
भाई बहनों का चिढ़ाना, वो कागज की नाव बनाना ,
याद बहुत आते हैं, वो पानी पनघट वाले दिन।
वो सखियों के संग जाना, वो किसी को देख खो जाना,
उन राहों से गुजरे आँखों में भर भर आते वो सारे दिन।
वक्त कहाँ ठहरा है, वो तो अपनी राह बड़ा है,
पर आगे बढ़कर भी न भूले वो दो चोटी वाले दिन।
बीत गया वो दौर, जो लौटके न आना है,सच तो यह हैं बनके गुल साँसों में महकेंगे वो गुजरे पुराने दिन।
अन्जू दीक्षित,
उत्तरप्रदेश।

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