कहां चल दिया अशफ़ाक , अखाड़े में नहीं चलना क्या ? आज तो बलविंदर के साथ दो दो हाथ करने हैं , राजेंद्र ने अशफ़ाक के कंधे पर एक धौल जमाई।

वही जा रहा हूं यार, आज अगर उसको ना पछाड़ा तो मेरा नाम भी अशफ़ाक नहीं। अशफ़ाक ने राजेंद्र के कंधे पर हाथ रखा।

चांदपुर गांव में आज दंगल  हो रहा था हर साल पंद्रह अगस्त और 26 जनवरी को यहां पर जूनियर वर्ग  और सीनियर वर्ग की कुश्ती होती थी जिसमें पिछले दो साल से बलविंदर जीत रहा था अशफ़ाक हार जरूर जाता लेकिन वो अपने दोस्त की खुशी में ही खुश था। इन तीनों दोस्तों की दोस्ती पूरे गांव में मशहूर थी । तीनों के परिवार भी एक दूसरे के सुख दुख में हमेशा शामिल होते थे। अगर अशफ़ाक के घर सिवइयां बनी है तो उसकी महक राजेंद्र और बलविंदर के घरों तक ना पहुंचे ऐसा हो ही नहीं सकता और वो सब हाजिर हो जाते इस दावत में वो भी पूरे हक के साथ।राजेंद्र के घर में दीवाली के दिए तब तक नहीं जलेंगे जब तक अशफ़ाक और बलविंदर का परिवार तैयार होकर राजेंद्र के घर नहीं आ जाता । और बलविंदर की लोहड़ी के गीत और भांगड़ा बिना अशफ़ाक और राजेंद्र के शामिल हुए बिना अधूरा था।

अशफ़ाक राजेंद्र और बलविंदर तीनों अखाड़े के मैदान में पहुंच गए थे, मैदान के चारों ओर  इतनी भीड़ थी कि तिल रखने की जगह भी नहीं थी। बीचो बीच तिरंगा झंडा बंधा हुआ था जो मुख्य अतिथि के आने के बाद फहराया जाना था।मुख्य अतिथि आए झंडा फहराया और एक छोटा भाषण दिया नाश्ता किया और चले गए ।

हर बार की तरह इस बार भी अशफ़ाक बलविंदर से हार गया , लेकिन अशफ़ाक ने गले लगकर उसे जीत की बधाई दी । यही तो है दोस्ती ,जो  हार जीत नहीं देखती सिर्फ दोस्त के चेहरे की खुशी देखती है। और जीतने वाला दोस्त अपनी जीत की खुशी नहीं मनाता पहले अपने दोस्त की हार का दुख करता है।

अखाड़े से आने के बाद तीनों बलविंदर के घर गए जहां उसकी बेबे ने मक्के की रोटी और सरसों का साग बनाया था। तीनों ने जमकर खाया। मक्खन लगी हुई रोटियां और हींग के बघार वाला। सरसों का साग , वाह मजा आ गया।
शाम पांच बजे से पहले तिरंगे को उतारना था चांदपुर में कोई भी कार्यक्रम होता तो तीनों दोस्तों की ही ड्यूटी लगती थी । लेकिन  बलविंदर को आज शहर जाना था ट्रैक्टर लेने के लिए इसलिए वो उन दोनों को ये जिम्मेदारी सौंप कर चला गया। राजेंद्र और अशफाक चार बजते ही वहां पहुंच गए अखाड़े का मैदान गांव से काफी दूर था।वो लोग तिरंगे को सम्मानपूर्वक उतारने की तैयारी कर रहे थे ताकि वो झुके भी ना और जमीन पर गिरे भी ना । तभी कुछ अवांछित तत्व वहां शराब की बोतलें लेकर आ गए और  वहीं बैठकर शराब पीने लगे। अशफ़ाक और राजेंद्र ने उनको मना किया तो वो लोग उनसे उलझने लगे बात बढ़ते बढ़ते गाली गलौज तक पहुंच गई शराब के नशे में वो लोग क्या बोल रहे थे उन्हें कुछ पता नहीं था एक आदमी खड़ा होकर भाषण देने लगा

भारत ने क्या किया हमारे लिए? ये हमारे लिए अच्छा देश नहीं हैं, यहां लोग सुरक्षित नहीं हैं, अंग्रेजों के शासन काल में न्यांय होता था ,आज अन्याय होता है , भेदभाव होता है,तीन रंगों का मतलब बलिदान, शांति और हरियाली नहीं ,खून, कफन और रोग है। मैं इस झंडे को उखाड़कर फेंक दूंगा  मुझे नहीं रहना इस देश में, मैं जा रहा हूं, दूसरे देश ,इतना कहकर वो उस झंडे को उखाड़ने लगा।

अब  अशफ़ाक और राजेंद्र से बर्दाश्त नहीं हुआ आखिर कोई सच्चा देशभक्त अपने देश का अपमान कैसे सह सकता है वो भी तिरंगे का अपमान, तब तक बलविंदर भी शहर से आ गया था । उन्होंने उस आदमी की बहुत धुनाई की । तभी एक और शराबी आ गया उसने तिरंगे को उखाड़ कर ऊपर उछाल दिया अशफ़ाक ने आगे कुछ ना सोचा उसने सिर्फ यही सोचा कि मुझे किसी भी कीमत पर तिरंगे को झुकने से और गिरने से बचाना है, उसने आव देखा ना ताव वो जमीन पर लेट गया और तिरंगा सीधे उसके पेट को चीरता हुआ घुस गया और वो झुकने  तभी अशफ़ाक ने अपने हाथ से उस झंडे को मजबूती से पकड़ लिया। और जोर से कहा जय हिंद , जय तिरंगा,वंदे मातरम्। और उसकी गर्दन एक ओर लुढ़क गई। राजेंद्र और बलविंदर अपने दोस्त की कुर्बानी के सामने नतमस्तक थे, उन्होंने अपने दोस्त अशफाक को सैल्यूट किया, उनके  दिल से आवाज निकल रही थी

"मुझे इश्क है वतन  से
मेरी जान जिंदगी तू
मेरा जान है तिरंगा
और मेरी बंदगी तू"


समाप्त
जय हिंद
जय भारत वंदेमातरम 
संगीता शर्मा प्रिया