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क्रोध की अग्नि जिया जलावे,
शनै शनै चिता तैयार।
तन खोया मन क्यों पछतावे,
मन में उठते हैं विचार।
पुन्न कर्म मानुष तन पाया
कुदरत का हम पर उपकार।
द्वेष भाव मे समय गवाया,
उड़ गया पंछी अंबर पार।
संगीता वर्मा, ✍️✍️
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