बड़े   सुनहरे  दिन  बचपन  के,
सदा   याद   आते  जीवन   में।
वह  खुशी  वह  लड़कपन  मेरा,
फिर मिल सकता क्या जीवन में?

उछलकूद कर दिन भर खेलूँ
माँ   के   हाथों  खाना  खाऊँ।
आँखमिचौनी   माँ   से  खेलूँ,
चंदा  देख  मैं  खुश  हो जाऊँ।।

सांझ ढले घर मैं जब आता ,
दूधभात  वह मुझे खिलाती।
माँ का सुखद स्पर्श मैं पाता,
लोरी  गाकर  मुझे   सुलाती।।

पिता का लाड़ला होता मैं,
घोड़ा बनकर  मुझे घुमाते।
चांद  तारे  तोड़कर   लाते,
हर  फरमाइश   पूरी करते।।

चंद खिलौने कभी  ले आते,
पेड़ा    रेवड़ियां   भी   लाते ।
देख  मुझे  खुश वे खुश होते,
मुझे   देख   फूले  न  समाते।।

जीवन सुख और संतोष भरा ,
दुख और  दर्द की नहीं छाया।
सरल, स्नेहमय जीवन वह था,
सुनहरे  दिन  रहे  बचपन  का।।


-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती     "दिवाकर"
(यह मेरी मौलिक रचना है । सर्वाधिकार सुरक्षित।)
(मुखचित्र गूगल से साभार)