" नीरा। मैं तुमसे दिल से प्यार करता हूं। तुम्हारे लिये जान भी दे सकता हूँ।"
नीरा ने तुरंत सोमेंद्र के होठों पर अंगुली रख दी।
" नहीं नही। अशुभ बातें मुख से नहीं निकालते।"
" तुम्हारा यही प्रेम तो मुझसे विवश कर देता है।"
सोमेंद्र ने अपनी बाहें फैला दीं । नीरा भले ही सोमेंद्र से प्रेम करती थी। पर कुछ हिचकिचा रही थी।
" अरे मुझसे प्रेम करती हो ना। वायदा करता हूं तुम्हें ही अपनी दुल्हन बनाऊंगा। "
सोमेंद्र के वायदे पर अविश्वास करने का प्रश्न ही न था। फिर प्रेमियों में तो थोड़ा बहुत चलता है। पर कुछ दिनों बाद थोड़ा बढकर ज्यादा हो गया। नीरा को सोमेंद्र के वायदे पर विश्वास था।
नीरा बहुत दिनों से सोमेंद्र का इंतजार कर रही है। अभी भी उसे विश्वास नहीं है कि सोमेंद्र ने उसे वायदे के जाल में फंसाया है। अभी भी वह दिल की ही बात सुन रही है। दिमाग को अनसुनी कर सोमेंद्र के वायदे की पूर्ति के समय का इंतजार कर रही है।
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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