सुना है वेदों में स्त्री  का
सम्मान बहुत था पहले
कालांतर में फिर क्यूं वो
अपमानित हो गई।

सुना है स्त्री पहले
शक्ति की मूरत थी
फिर धीरे धीरे क्यूं वो
लाचार हो गई।

सुना है स्त्री पहले 
ज्ञान का सागर थी
फिर धीरे धीरे क्यूं वो
पिछड़ सी गई।

सुना है स्त्री पहले
हर कला में दक्ष थी
फिर क्यूं धीरे धीरे
कहीं खो सी गई।

सुना है स्त्री पहले
हर क्षेत्र से अवगत थी
फिर क्यूं धीरे धीरे
खुद में ही सिमट गई।

क्या पुरुष हैं इसका कारण ?
या वो खुद ही है अनभिज्ञ कहीं
जो सौंप देती है सारे
अधिकार पुरुष को अपने सभी।

थोड़ा तो बदल रहा है
ये पुरुषों का भी समाज
देने अब फिर से लगा है
स्त्री को उसका अधिकार।

स्त्री होना खुद में हीं
सिमट जाना नहीं होता
स्त्री होना दो कदम 
पीछे चलना ही नहीं होता।

स्त्री होना खुद की इच्छा को
हमेशा दबाना ही नहीं होता
स्त्री होना पलकों को झुकाकर
चलना ही नहीं होता।

फिर भी स्त्री ये सभी काम
करती है सहजता से
क्या ये सहजता उसकी
लाचारी होती है?

नहीं, ये सहजता तो उसकी
खुद्दारी होती है
क्यों कि स्त्री स्वभाव से
शायद ऐसी ही होती है।

क्या ये स्वभाव पुरुषों के लिए
नहीं प्रश्न चिह्न बन जाता है
क्यूं ये सारी उम्मीदें बस 
स्त्री से ही की जाती है।

क्यों कि, बस स्त्री ही खुद को
बड़ी सहजता से
हर रूप में ढाल पाती है
और पुरुषों के लिए
एक उत्तर बन जाती है।

बिना कोई प्रश्न किए
इस पुरुष समाज से
बड़ी ही खामोशी से
एक प्रश्न फिर से वो दे जाती है।

कि एक स्त्री हर रूप को अपने
इतनी सहजता से कैसे निभाती है?
फिर भी ताकतवर कौन?
क्या ये पुरुष समाज?

जो स्त्री के हर रूप से 
अवगत होकर भी
लाचार ही उसे बताता है
इसीलिए तो ये समाज
पुरुष प्रधान कहलाता है।।

कविता गौतम✍️