भावुक हूँ बहुत मैं
भावनाओं में खो जाती हूँ ।
या तो जुड़ती नही हूँ,
जुड़ती हूँ तो,
शिद्दत से निभाती हूँ।
छोटी सी बात भी मुझे
कभी बहुत खुशी दे जाती हैं
छोटी सी बात ही कभी
दुखी भी कर जाती हैं।
रिश्ता नहीं जोड़ती हूँ
मैं हर किसी से
दिल को जो भा जाए
निभाती हूँ उसी से।
लाग-लपेट चापलूसी से
कोसों दूर रहती हूँ
जो भी हो दिल मे
बेबाक कह जाती हूँ
कुछ बेगाने भी मुझे
अपने से ही लगतें हैं
कुछ अपने है जो
रास नहीं आते है।
सुलझी हुई हूँ मैं,
अपने आप में उलझी हुई
भावनाओं को मेरी
ठेस नहीं पहुचाना,
मोम सी पिघलती हूँ
पर जलती हूँ शमा सी।
समझ में आ जाऊँ
आसानी से
मैं कोई संज्ञा, सर्वनाम नही
मैं हूँ अलंकारों सी
समझना इतना आसान नहीं।
कभी हूँ उथली तरंगिनी
रेत नजर में आ जाए,
कभी अर्णव सी गहराई हूँ मैं
राज कई छुपाती सी।
जैसी भी हूँ हँसती बहुत हूँ
औरों को भी हँसाती हूँ
आँसू अपने अंतर्मन के,
एक चेहरे के आगे गिराती हूँ।
भावुक हूँ बहुत मैं
भावनाओं में बह जाती हूँ ।
🌹🌹😊😊🌹🌹
कवयित्री :-गरिमा राकेश गौत्तम
पता:-कोटा राजस्थान

0 टिप्पणियाँ