पानी का खजाना दिया है।
सागर, सरोवर और सरिता,
बादल में जल निक्षिप्त किया है।।
सप्तसिंधु, मानसरोवर, जैसे,
पुण्यप्रद जलराशि तुमने दी।
सुरसरिता गंगा दिया तुमने,
यमुना , गोदावरी , सरस्वती।।
नर्मदा , सिंधु, कावेरी, भीमा,
कितनी ही देवनदी बहती।
पंपा, पुष्कर,ब्रह्मसरोवर- सा,
पुण्यसरोवर भी विराजती।।
मनुज पर तुमने कृपादृष्टि की,
शुद्ध अपार जलराशि उसे दी।
पर स्वार्थी नर करे भूल ही,
दूषित कर जलस्त्रोतों को ही।।
मानव जल का अपचय करता,
बाँध बना जलमार्ग रोकता।
तिरस्कार और दोहन करता,
जलखंडों का प्रदूषण करता।।
पवित्र जल अपार दिया प्रभु ने,
संचित, पूजित करो तुम इसको।
अपचय, प्रदूषण, यदि न रोके,
बूंद -बूंद जल को तरसोगे ।।
-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर "
(यह मेरी मौलिक रचना है। सर्वाधिकार सुरक्षित।)
(मुखचित्र गूगल से साभार)

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