वो दो बारहसिंघा
पानी पीने नदी को जाते
देख परछाई पानी मे अपनी
अपने सुंदर सिंघों पर रीझे
ईश्वर ने कितनी सुंदर सिंघे दी
सोच सोच इतराए
पर नज़र पड़ी जब पैरों पर
वो पतला लम्बा कुरूप नज़र आया
हर्षित मन थोड़ा मुरझाया
काश!! सिंघों की तरह
पैर भी सुंदर देता
तो हे विधाता तेरा क्या जाता
इतने में एक आहट से चौंका
शेर को खुद की ओर बढ़ता पाया
प्राण बचाने को छलांग लगाई
लम्बे डग भरता जंगल के भीतर भागा
एक घनी झाड़ी में छुपकर
कुछ सांसे राहत की ली
अचानक फिर इक आहट ने घबराया
कदम जो भरना चाहा हवा सी
सिंघों ने रोड़ा अटकाया
लटका,झटका जोर लगाया
झाड़ियों में फँसा सिंघ न निकल पाया
शेर को अपने निकट पाया
जाते जाते प्राण समझ ये आया
जिन पैरो को कोसता रहा
वही समय पर काम आया
बेकार है खूबसूरती ऐसी
जिसके कारण प्राण गवायाँ
बचपन में ये कहानी पढ़ी थी, जिसे काव्य रूप दिया। बचपन मे पढ़ी या सुनी हर कहानी के अंत में उस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है यह ज़रूर बताया जाता था। इस कहानी से भी एक शिक्षा मिलती है।
किसी भी वस्तु का महत्त्व उसकी सुंदरता में नहीं, बल्कि उसके गुणों में है।
हमें हमेशा याद रखनी चाहिए कि वो दो बारहसिंघा हम दो इंसान भी हो सकते हैं और अपने अहम,अहंकार,द्वेष,लालच,जलन जैसे सिंघों से फँस कर अपनी रिश्ते,अपनी इज़्ज़त यहाँ तक की अपनी जान भी गवाँ सकते हैं।
सचेत रहने की आवश्यकता है......
मधुलिका सिन्हा
कोलकाता

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