साधना
छन छन छन छन
छेनी चल रही थी
शिल्पी की साधना
अनवरत बढ़ रही थी
पाषाण भी टूट कर
खण्ड खण्ड हो रहा था
एक आकृति का
स्वरूप ले रहा था
वर्षों वर्षों तक चल रही
अथक साधना
शिल्पी का यौवन
विगलित कर रही थी
छन छन शिल्पी की छेनी
निरन्तर चलती रही थी
तप की अग्नि में तप कर
पाषाण और शिल्पी
दोनों को तपाती रही थी
अंततः जो स्वरूप मूर्त हुआ
वही तो सूर्यदेव का मंदिर
प्रसिद्ध कोणार्क हुआ।
रेनु सिंह
स्वरचित

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