भावनाओं के समंदर में डुबकी लगाकर शब्दों के मोती को पाया है मैंने,
दिल के वरक पर कल्पनाओं की कलम से खूबसूरत सा सपना सजाया है मैंने,
क्षणभंगुर से जीवन में दौलत और शोहरत का इतना घमंड मत कर ए बन्दे,
क्योंकि सागर की अनन्त लहरों को चट्टानों से टकराकर बिखरते हुए देखा है मैंने।।
अंतःकरण पर पड़े हुए धूमिल से पर्दे को हटाया है मैंने,
तो मन की खिड़कियों को खुला हुआ पाया है मैंने।
शांत एकाग्र होकर जब कल्पनाओं में खोती हूँ,
तो चुन-चुनकर अनगिनत शब्दों के मोती चुगती हूँ।
अज्ञानता का पर्दा तब अपने आप उठने लगता है,
हरीतिमा सा चमक उठता है हृदय और ज्ञान का सूर्योदय हो जाता है।
शीला द्विवेदी "अक्षरा"

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