आर्मी कैप्टन राज सिंह यादव के घर पुत्र ने जन्म लिया। बैसे तो सारे ही बच्चे सुंदर लगते हैं। पर एकदम गोरी देह के लङके को जो भी देखता, बस देखता रह जाता। सौर में ही राज सिंह की औरत संतोष को बधाईयाँ मिलने लगीं।
" बङा सुंदर पूत जना है। बिल्कुल बाप पर गया है। सही कहा न ताई।"
युवती के प्रश्न पर बृद्धा कहाँ चुप रहती।
" सही बोलती है तू। राज को इन्हीं हाथों से खिलाया है। एकदम उसी की तरह है। उसी की तरह बनेगा। एकदम बहादुर। बाप की तरह फौज का अधिकारी।"
लङके का नाम बदन सिंह रखा। पर बचपन से ही गांव की महिलाएं उसे फौजी कहने लगीं। लङके को फौज में भेजने की तमन्ना राज सिंह को भी थी। तो फौजी नाम पर एतराज कैसा। पर कुछ ही सालों के बाद लङके का उप नाम हसी का कारण बन गया। अब कितना भी कोशिश करो पर मजाक एक बार बन जाये तो उसे सुधार नहीं सकते।
" देखो... यह है देश के भविष्य का फौजी। एकदम तीन फुटा। लगता है कि भविष्य में तीन फुट के युवक ही फौज में जायेंगें।"
" मेरा नाम बदन सिंह है। मेरा नाम बोला करो।"
" चल हट। अब नाटे को फौजी बनने में भी आफत है।"
बालक का मन कितना कोमल होता है। पर समाज तो वास्तव में अपना मनोरंजन देखती है। साथी छात्रों को कोई समझाने बाला न था ।न तो उनके अभिवावक और न शिक्षक... ।
नाटेपन की बीमारी से पीड़ित एक बालक फौजी तो नहीं बन सकता था। पर पढ लिख कर एक जिम्मेदार नागरिक बन सकता था। पर अपमान की धारा को एक बाल मन कितना बर्दाश्त करता। पढाई भी फौजी के भाग्य में न थी।
समाज की तो अलग बात है। पर माता और पिता का स्नेह भी छोटे भाई के हिस्से आया।
" फौजी.. चल यह काम कर दे। सभी को खाना खिला दे। बाजार से सब्जी ले आ।" बस इन्हीं बातों के लिये फौजी को याद किया जाता। उसने खुद खाना खाया या नहीं, इसकी चिंता भी शायद किसी को न थी।
तीस साल का फौजी एक होटल में बेरा का काम करता। उसका छोटा भाई फौज में कैप्टन था। छोटे भाई के लिये कई रिश्ते आये। आखिर में उसकी शादी बहुत सुंदर लङकी से हो गयी ।
" बेटा.. कुछ तो समझ है या नहीं। घर में तेरी बहू आ गयी।और अभी भी बेधड़क घर में चला आता है।" आंखों में आंसू भरे फौजी के मुख से यह भी नहीं निकला कि बैठक से पिता जी ने भगा दिया था। तो रात में सोने की जगह तलाश रहा था। अब फौजी का जीवन होटल में ही ज्यादा गुजर रहा था। वहीं काम करता, वहीं खाता और वहीं सो जाता। हालांकि एक बार घर के चक्कर जरूर लगाता था। बाजार से सामान लाना अभी भी उसी की जिम्मेदारी थी।
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गुन्जन गिरोह और निरंजन गिरोह की मीटिंग रात के ग्यारह बजे पुल के पास हो रही थी। गुन्जन वान्टेड ड्रग्स माफिया था। और निरंजन हथियारों की अवैध तस्करी में वांछित था। दोनो अपराधी एक दूसरे की मदद करते पर कभी पकङे नहीं गये। पर आज अचानक पुलिस ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। घंटों गोलीबारी में दोनों गेंगों के कई बदमाश मारे गये। और कई पकङे गये। पुलिस के लिये यह बङी कामयाबी थी। पुलिस अधीक्षक पत्रकारों के प्रश्नों का उत्तर दे रहे थे।
" सर। इतनी बङी सूचना आपको कैसे मिली।" एक प्रतिष्ठित न्यूज चैनल की पत्रकार के प्रश्न का उत्तर देने में पुलिस अधीक्षक मुस्करा गये।
" मैडम। आपको बताना चाहता हूँ कि हमारे देश की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी रो है। रो के जावाज एजेंट पूरे देश में छिपे हुए हैं। आम लोगों की तरह रहते हैं। उनकी पहचान केवल रो के अधिकारियों को है। हर छोटी सी छोटी बात की खबर रो को और रो से संबंधित सुरक्षा एजेंसियों को मिल जाती है। कोई भी सूचना गलत हो पर रो की सूचना कभी गलत नहीं होती। हमें रो की तरफ से ही संदेश आया था। और समय पर कार्यवाही करने से सभी बदमाश पकङ में आ गये। "
पुलिस अधीक्षक का बयान समाचार चैनलों और समाचार पत्रों की सुर्खियां बन गया।
उसी रात होटल में सो रहे फौजी के मोवाइल पर एक फोन आया।
" फौजी। यू आर जीनियस। होटल में खाना खाने आये गुंजन गिरोह के आदमी के कोड वर्ड को तूने सही डिकोड किया। चीफ बहुत खुश हैं। तेरे लिये बङा इनाम भेजने बाले हैं।"
" सर चीफ को मेरा प्रणाम कहना। बचपन से ही फौज में रहकर देश की सेवा की इच्छा थी। पर नाटे होने के कारण संभव नहीं थी। यह तो चीफ का बङप्पन है कि उन्होंने मुझे रो का एजेंट बनने लायक समझा। उनका आभारी हूं कि उन्होंने मुझे देश सेवा की राह बतायी। मेरा इनाम शिमला में बने नाटे बच्चों के विद्यालय को दे देना जैसे कि हर महीने मेरा वेतन मेरी इच्छा से देते आये हों। वेतन और इनाम के लिये फौजी देश सेवा नहीं करता। बल्कि इसलिये करता है कि उसे देश से प्यार है। और एक बात और सर... आज होटल में कुछ संदिग्ध भोजन कर रहे थे। कह रहे थे कि पिंजरे का पंछी आजाद होगा। "
" इट इज डैंजरस। अभी चीफ को इत्तला करना है। कोड को डिकोड करना जरूरी है। " दूसरी तरफ से आवाज आयी।
फोन रखकर फौजी लेटा ही था कि उसका फोन दुबारा बजने लगा। माॅ का फोन था। इतनी रात को.. कैसे । फौजी ने फोन उठाया।
" अब तो सचमुच लगने लगा कि तुझ जैसी औलाद को क्यों जन्मा। एक तरफ तेरा भाई फौज में रहकर देश की सेवा कर रहा है। दूसरी तरफ बङे महाशय को यह भी फिक्र नहीं है कि घर के लिये बाजार से सामान ले आयें।"
" ठीक है माॅ। कल घर आता हूं।" फौजी माॅ को यह बता भी नहीं पाया कि देश की सेवा तो वह भी कर रहा है। और वह भी अवैतनिक...।
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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