इसे कहानी न समझिएगा ।सच है ये मेरे जीवन का बहुत ही मीठा ,मधुर ,सुंदर और जितनी अलंकारों से अलंकृत कर सकूँ वैसा सच ।

मेरे मायके में बच्चों की बड़ी कमी थी ,ऐसे में जब भी कोई रिश्तेदार  अपने बच्चे को ले कर आते तो हम सभी जी जान से उसकी ख़ातिर तवज्जो में लग जाते थे ।दादी से लेकर पोते
पोतियों तक सबको उसी की चिंता होती ।उसने क्या खाया ,क्यों रोया उसका खाना उसके खिलौने  बड़ी ततपरता से दिया जाता ।ऐसे ही हँसते खेलते मैं बड़ी हो गई और इतनी बड़ी की मेरा ब्याह हो गया ।

अपनी तकदीर कहूँ या ईश्वर की असीम कृपा की तुरत फुरत मेरे दोनों बच्चे भी हो गए । खुशी तो जैसे आसमान के तारे बन मुझ पर बरस रही थी और मैं उन तारों को अपने आँचल में समेट उनकी परवरिश के कठिन कर्तव्य की छतरी ओढ़ 
ली ,ठान जो लिया था कि जिसे जन्म दिया उसे उच्चतम परवरिश देना मेरी प्राथमिकता होगी ।

देखते - देखते बच्चे बड़े होने लगे ।आज भी याद है उनके स्कूल का पहला दिन ।स्कूल के गेट से अंदर जाते उनकी गीली ऑंखे और बिचकते होंठ मानो कह रहे हों  मुझे छोड़ कर न जाओ माँ न जाओ ।इधर मेरा कलेजा भी पानी -पानी हुआ जा रहा था ।लगा दौड़ कर रोक लूँ ,बढ़ कर उठा लूँ अपनी गोद में पर जैसे ही उनके सुनहरे भविष्य की पहली सीढ़ी दिखी की मैं रुक गई और पलट कर घर की ओर बढ़ गयी थी ।

फिर उनकी क्लास दर क्लास आगे बढ़ने का दौर शुरू हुआ ।तब की बातें कहूँ तो ,स्कूल खत्म होने पर घर आते  वक्त लेने मैं ही जाती थी ।आते -आते सिर्फ बातें ही होती थीं ।बस मेरे पूछते ही की स्कूल में आज क्या - क्या हुआ, उनकी टीचरों ने क्या बताया क्या सिखाया ,उनकी डाँट फटकार से ले कर दोस्तों के साथ खेल ,लड़ाई ,मार पिटाई की मधुर जुगलबन्दी सुनते -सुनते घर पहुंच जाती फिर भी किस्सा खत्म न होता था ।दोनों एक दूसरे को चुप करा अपनी बातें कहने की होड़ में अपनी नापसन्द सब्ज़ी को भी कब खा लेते उन्हें पता भी न चलता था ।उनकी बातों में बातें करती , उनके साथ कितने ही खेल खेलती थी ।कभी क्रिकेट ,कभी कैरम ,कभी लूडो ,तो कभी घर -घर का खेल खेलती ।कितने ही कार्टून कितनी फिल्में हम साथ - साथ देखते ।फिर हँसते उनकी अच्छाइयां गिनाते ,आलोचना करते  और अपनी पसंदीदा कार्टूनों की पैरवी में खूब बहस करते और प्रायः लड़ाइयाँ भी हो जाती थीं ।मैं तो जैसे उन्ही के साथ बड़ी हो रही थी और वो ही मेरे दोस्त बन गए ,पक्के वाले दोस्त ।बाकी सारे दोस्त कहीं गुम से हो गए ।दोस्ती तो बस एक एहसास है ,कब किसे आपका दोस्त बना दे ,समझ पाना हमारे बस में नही होता ।और फिर उम्र के हर पड़ाव को हमने साथ -साथ पार किया बस फर्क इतना ही था कि बच्चे उत्साह ,जिज्ञासा और बटोरते अनुभव के साथ और मैं अपनी अनुभवी सोच के 
साथ ।

समय तो बस पंख लगा कर उड़ना जानता है ।आज भी उन्हीं से गप्पें मारती हूँ ,उन्ही के साथ फिल्में देखती हूँ ,हा बातों का लहज़ा बदल गया, रोजमर्रे की बातों के साथ साथ गम्भीर बातों पर भी विचारों का आदान - प्रदान करती हूँ ,दोस्त जो ठहरे ।बस उनकी दोस्ती में मैने अपने अनुभवों का तड़का लगा अपनी दोस्ती को और भी तीखा ,चटपटा बना दिया ।
मधुलिका सिन्हा
कोलकाता
मौलिक और सर्वाधिकार सुरक्षित