किताबों के पन्ने तो पढ़ लोगे तुम
क्या कभी रूह को भी पढ़ पाओगे तुम।
हमेशा है चाहा इस देह को तुमने
क्या कभी रूह को भी समझ पाओगे तुम।
खूब संवारा है इस काया को तुमने
क्या कभी रूह को भी सजा पाओगे तुम।
छोड़ के यूं मोह इस नश्वरता का
क्या कभी रूह को भी पहचान पाओगे तुम।
यूं मूंद करके दोनो चक्षुओं को अपने
क्या खुद में ही कभी झांक पाओगे तुम ।
छोड़ के इन सारे आडंबरों को
क्या कभी परमात्मा से भी मिल पाओगे तुम।
देखी जो दुनियां की खूबसूरती तुमनें
क्या उसे रूह में भी ढूंढ पाओगे तुम।
रहते हुए भी इस संसार सागर में
क्या कभी रूह को रूह से मिला पाओगे तुम।
कविता गौतम✍️

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