ये दौलत, शोहरत, उल्फत, चाहत 
बस चार दिन की चांदनी फिर अँधेरी रात है 

हो बस सबके दिलों मे मोहब्बत 
सबके पहलू मे बिखरे जज़्बात हैं 

हंसना, रोना, पाना खोना 
ये तो फलसफा है जिंदगी का 

हो बस सबके दिलों मे हुकूमत 
जब सब साथ हों तो क्या बात है

मिलना, बिछड़ना, उतार चढाव 
ये तो सिलसिला है जिंदगी का 

हो बस सबके दिलों मे इज़्ज़त 
ये तो एहतराम की शुरुआत है

जहमत, रहमत, दुर्भाग्य, खुशकिस्मत 
ये तो तजुर्बा है जिंदगी का 

समझो बस अपने कर्म को इबादत 
अभी तो दुवाओं की बरसात है 
मुकेश लखनवी