परिचय :यह मेरी आरंभिक कहानियों में से है। अतः संभव है कि कुछ पाठकों को शिकायत रहे कि इस कहानी में उस तरह के प्रयोग नहीं हैं, जो मैं अक्सर अपनी कहानियों में करता हूं। संभव है कि प्रस्तुतीकरण भी अलग लगे। पर यह वर्तमान आजादी के महीने के लिये एक अच्छी कहानी है। जिसमें देश के विकास में शिक्षा के महत्व को समझाने का प्रयास किया है। 

*********

"चाची। आज बच्चे स्कूल पढने नहीं आये। स्कूल रोज भेजा करो।' 
सिद्धि ने थोड़ा जोर से बोल दिया। पढाने की इच्छा लेकर छोटे गांव रसूदपुर में आयी। बच्चों को पढाने में उसे फक्र महसूस होता था। तभी तो साइकिल चलाकर रोज पढाने आती। इतनी दूर होने पर भी कभी नागा नहीं करती। गांव में उसे प्रेम और सम्मान दोनो मिला। पर सचमुच अभी भी मजबूरी कहो या गांव बालों की सोच, बच्चों को पढाने में लोगों को रुचि नहीं थी। 

'मास्टरनी जी। फसल कट रही है। अभी बच्चे पढने नहीं आ पायेंगे। '

यह अक्सर की बात थी। बच्चों को पढाने के स्थान पर लोग उनसे खेतों में काम कराते। सिद्धि ने एक एक के घर जाकर बच्चों का दाखिला कराया। इतनी मेहनत करती। पर परिणाम ढाक के तीन पात रहता। 

गांव बालों को पुरानी मास्टरनी अच्छी लगती। एक सप्ताह में एक बार आ जाती। किसी के पीछे नहीं पङती। पढाओ या मत पढाओ। यह हमारी मर्जी। तुम्हें क्या। बच्चों का नाम लिखा दिया। अब चुहिया के बच्चे बिल ही खोदेंगे। कौन कलक्टरी करेंगे। पर मास्टरनी जी, बेकार खुद परेशान होती हैं और सबको करती हैं। 

पर सिद्धि भी निरी बेवकूफ़ थी। जो आराम की नौकरी उसे पसंद न थी। देश पढेगा तभी तो बढेगा का नारा सुन लिया और देश तो नही पर रसूदपुर गांव को आगे बढाने की इच्छा जरूर थी। 

'देखो चाची। बच्चे पढेंगे तो आगे बढ़ेंगे। आप क्या चाहती हों। इसी तरह बच्चों की जिंदगी चलेगी। बच्चे पढेंगे। फिर बङे अधिकारी बनेंगे। आपकी और गांव दोनों की इज्जत होगी। '

सचमुच सिद्धि बोलती तो तेज थी पर कहती सही। धीरे धीरे उसकी मेहनत रंग लायी। लोग भी समझने लगे। आखिर मास्टरनी का कौन सा खुद का मतलब है। जो कह रहीं हैंं हमारे बच्चों की भलाई के लिये कह रहीं हैं। 

सब तो न कभी बदले और न बदल सकते हैं। पर कई बदल गये। मास्टरनी से गांव बाले डरने लगे जो वास्तव में अदब का सूचक है। 

...................................................... 

'रमुआ के बापू। आज मास्टरनी आयी थी। बोल रहीं थीं छोरी को भी स्कूल भेजा करो। '

' अरे। छोरी को पढाने से क्या फायदा। उसे चौका चूल्हा करना है। सो तू उसे सिखा रही है। '

' वोई तो मेने कही। पर बोलने लगी। चाची। आप गलत कह रही हो। छोरी आपकी काहू ते कम नाहे । अब मैं भी तो छोरी हूं। मैं भी पढी लिखी हूं। अपनी कलक्टर मैडम भी पढी हैं। '

' अरे। मास्टरनी तो बाबली हो रही है। छोरिन को पढाने की का जरूरत। '

' सही कही। पर बोल रही थी। चाची। आप हिसाब किताब में गङबङ कौं कर देती हों। चिट्ठी पढाने दूर तक चौं भाजती हों। अगर पढी लिखी होतीं तो जी ना होतो। रमुआ के बापू। देखो। मास्टरनी की बात सही लागे है। छोरिन को हूं पढबे भेजन में का दिक्कत। '

रमुआ का बापू चुप रह गया।  सचमुच मास्टरनी की बात गलत तो नहीं है। रमुआ की अम्मा आये दिन हिसाब गलत कर देती है। लाला चालाकी कर देता है। वह कई बार गुस्से में उसे पीट देता। वैसे पीटने का अफसोस तो बहुत होता। पर नुकसान होने पर मति फिर जाती है। मास्टरनी सही बोलती है। कल छोरी अपने ससुराल जायेगी और उसका आदमी भी उसे नुकसान होने पर पीटेगा। 

लोगों की सोच खुद के व्यवहार पर निर्भर है। नारद जी ने भी  बाल्मीकि को मरा जाप का उपदेश दिया था। सिद्धि समझ चुकी थी कि गांव बालों को उन्हीं की तरह समझा सकते हैं। न तो औरत और न मर्द चाहते थे कि छोरियां हिसाब गङबङ कर ससुराल में पिटें। बस बेटियों को ससुराल में पिटने से बचाने के लिये लङकियां स्कूल भेजी जाने लगीं। पर अभी तो बहुत राह तय करनी है। 

............................................ 

'रमुआ के बापू। आज मास्टरनी आयी थी। '

आज रमुआ का बापू मास्टरनी के नाम पर गुस्सा नहीं हुआ। अब ध्यान से सुनने लगा। मास्टरनी वैसे भी बहुत अच्छी हैं। हमारे भले के लिये ही तो इतनी मेहनत करती हैं। 
' हाॅ। अब आगे बता भी। '
' जी कह रहीं कि चाची। तुमऊं मो ते रोज एक घंटा पढ लेओ करो। '

रमुआ का बापू एकदम खुश हो गया। अगर रमुआ की अम्मा नेक आद पढ लें तो हिसाब में गङबङ ना करेगी। नुकसान न हो तो खुद को भी चैन। 

' तो इत्ता सोच का रही है। मास्टरनी पढायें तो पढ लियो। '

' पर रमुआ के बापू। इस उमर में। शरम तो आयेगी। '

' घनी बाबरी है। जा में का शरम। '
' पर घन्नो और सुंदरिया के आदमी तो उने मना कर रहे हैं। मैं अकेला पढकर का करूंगी। '

' घने बेबकूफ लोग हैं। हिसाब गङबङ हो तो औरत को पीटने में परेशानी नाहे। पर मास्टरनी खुद पढान कूं तैयार हैं तो परेशानी। उनते तो मैं बात करूंगो। तू कल ते पढबे की तैयारी कर। 

.......…............................. 

सिद्धि की मेहनत रंग लायी। अब रसूदपुर में कोई निरक्षर न था। सरकार की योजनाएं भी गांव बालों को पता थीं। अब लाला का उधारी का काम तो बंद था। गांव बाले जरूरत पर बैंकों से उधार लेते। किसी भी घर में मास्टरनी की सलाह के बिना कोई काम न होता। लङका हो या लङकी सब पढ रहे थे। प्राथमिक पढाई के बाद कस्बे में पढना होता। पर कस्बे में खुद सिद्धि का घर है। तो बच्चों को कोई तकलीफ न हुई। कई सालों बाद रसूदपुर पूर्ण साक्षर गांव था। गांव के कई लङके ही नहीं बल्कि लङकियां भी विभिन्न विभागों में अधिकारी थीं।  सिद्धि का तबादला हुआ तो गांव बालों ने जिलाधिकारी से मिलकर उसका तबादला रुकबा दिया। और जब सिद्धि सेवानिवृत्त हुईं तो कई गांव बाले रोने लगे। शिक्षा विभाग के बङे अधिकारी ने इतना कहा कि अगर आप लोग मास्टरनी को दूसरे स्थान  पर जाने देते तो रसूदपुर की तरह और भी कई गांव शिक्षा के प्रकाश से जगमगाते। जितना पढेगा, इंडिया उतना ही बढेगा। 
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'