नीले गगन के तले.. धरती का प्यार पले.. गुनगुनाता पार्थ अपनी मस्ती में चला जा रहा था.. धरा गुनगुनाते पार्थ की आवाज़ सुनकर अपनी पढ़ाई छोड़ खिड़की पर आ खड़ी हुई...पार्थ और धरा पड़ोसी थे.. . धरा स्नातक की द्वितीय वर्ष की छात्रा... पार्थ इंजीनियरिंग कम्प्लीट कर घर आया था.. दो महीने बाद एक बड़ी कंपनी में जॉइनिंग थी उसकी...पार्थ धरा को बचपन से ही पसंद करता था.. और धरा को पार्थ के इस गुनगुनाहट से प्यार था... पता नहीं क्या था उस गुनगुनाहट में.. धरा ताजगी से भर उठती थी.. कितनी भी परेशान हो.. उत्साह दुगुना हो जाता था..सारी परेशानियाँ भूल जाती थी... क्या था ये.. खुद धरा भी नहीं समझ पाती थी...
आज की पार्टी पार्थ की सफ़लता के लिए रखी गई थी.. धरा को पार्थ की माँ खुद आकर निमंत्रण दे गई हैं.. धरा को अटपटा लगा..फिर अपने काम में मस्त हो गई... उसे क्या पता था कि पार्थ की माँ हमेशा से जानती हैं कि पार्थ धरा को पसंद करता है.... जिसे उन्होंने एक सकारात्मक मोड़ देते हुए कहा था.. प्यार का मौसम तभी आता है बेटा... जब तुम अपने प्यार को सारी ख़ुशियाँ देने लायक बन सको... प्यार सिर्फ़ प्रपोज कर देना या मंडप पर बैठ जाना नहीं है..प्यार का मौसम अपने साथ साथ खुशी और ग़म दोनों लाता है... प्यार के मौसम को समझने लायक तुम बन गए हो... जिस दिन मुझे ऐसा लगेगा.. उस दिन मैं खुद तुम्हारी पसंद से बात करुँगी... लेकिन ये भी ध्यान रखना अगर उसने मना कर दिया तो मैं उसकी "ना" की इज्जत करुँगी और तुमसे भी मेरी यही अपेक्षा होगी... और पार्थ उस दिन से ही जी जान से जुट गया... उसके बाद हर क्षेत्र में अव्वल आता रहा..जब से माँ ने कहा है... आज की पार्टी के दौरान धरा और उसके मम्मी पापा से बात करेंगी.. उसकी खुशी का ठिकाना नहीं है... नीले रंग के स्कर्ट टॉप में धरा कयामत लग रही थी.. जो भी देख रहा था.. बिना तारीफ किए नहीं रह रहा था... कितनी खूबसूरत लग रही है मेरी बच्ची कहकर पार्थ की मम्मी ने तो बाकायदा बलैयां ले ली उसकी.. धरा इधर उधर अपनी हमउम्र लड़कियों के साथ व्यस्त हो गई... पार्थ अपने दोस्तों के साथ व्यस्त हो गया... पर उसकी नजरें अपने मम्मी पापा पर ही टिकी थी.. कब वो धरा के पेरेंट्स से बात करेंगे..
डिनर टेबल पर धरा के पेरेंट्स के साथ औपचारिक बातों के साथ साथ पार्थ की शादी की भी चर्चा होने लगी.. बातों ही बातों में पार्थ की मम्मी ने धरा का हाथ पार्थ के लिए माँग लिया... अचानक आए इस प्रस्ताव से धरा के पेरेंट्स अचंभित रह गए और धरा की मर्जी जानने के बाद ही निर्णय लेने की बात कही...
जब धरा के पेरेंट्स धरा से पार्थ के प्रस्ताव के बारे में बता कर उसकी मर्जी पूछ रहे थे... इत्तफाक से पार्थ "तू मेरी जिन्दगी है" गुनगुनाता हुआ जा रहा है.. और धरा के मुँह से बेसाख्ता हाँ निकल गया... धरा के द्वितीय वर्ष की परीक्षा के बाद शादी का मुहूर्त रखा गया....
खूब धूमधाम से शादी हुई... विदा होकर ससुराल आ गई धरा... पार्थ भी अब तक मुंबई में ऑफिस जॉइन कर चुका था.. और धरा को साथ ले जाना चाहता था... लेकिन पार्थ की माँ ने ये कहकर मना कर दिया कि अगर प्यार का मौसम तुम दोनों को हमेशा जीवंत चाहिए तो धरा स्नातक कम्प्लीट करके ही मुंबई जाएगी... अभी एक साल बचा था... धरा ने कहा वहाँ जाकर भी कर सकती है.. पार्थ की माँ ने साफ़ कर दिया.. हर हाल में स्नातक के बाद ही जाना है.. पार्थ ने धरा को अपनी सारी कहानी सुनाते हुए कहा... माँ पढ़ाई के साथ कोई समझौता नहीं करेंगी..
पार्थ मुंबई चला गया..देखते देखते एक साल गुजर गया... सास के गाइडेंस में धरा स्नातक के साथ कंप्युटर में भी एक साल का डिप्लोमा कर लेती है.... इस बीच कभी कभी सासु माँ को फोन पर पार्थ के साथ साथ धीमी आवाज में बातें करते देख धरा विचलित हो जाती थी ...अब वो समय भी आ गया.. जब शुभ मुहूर्त देखकर पार्थ के साथ धरा को मुंबई के लिए विदा करती हैं...... सासु माँ की आँखों में दोनों के लिए आशीर्वाद के साथ साथ जुदाई के आँसू थे ...और धरा की आँखों में भविष्य के स्वप्निल सपनों के साथ सासु माँ से दूर होने के गम में आँसू झिलमिला रहे थे..
पार्थ की माँ पगली कहकर उसे गले लगा लेती है.. पार्थ के पापा भी हम सब आते रहेंगे कहकर दोनों को विदा करते हैं...
धरा मुंबई में पार्थ के साथ घर पहुँचती है तो घर का नाम "प्यार का मौसम" देख पार्थ का चेहरा देखने लगती है...
पार्थ - अंदर तो चलो... तभी कुछ बताऊँगा ना..
धरा को घर बहुत पसंद आता है.. घर की सजावट.. रंग सबकुछ बिल्कुल उसके मन मुताबिक था... बेडरूम की खिड़की से छोटी छोटी पहाड़ियाँ और हरियाली की सुन्दरता देखते ही बन रही थी... धरा की नजरें उसके दीदार में लगी थी... पार्थ बगल में आकर खड़ा हो जाता है..
पार्थ - माँ पापा को बता दिया है मैंने... . हम लोग पहुँच गए हैं...
पार्थ - कैसा लगा हमारा ये "प्यार का मौसम" महल...
धरा - हमारा???
पार्थ - जी मैडम.. मेरी इच्छा थी.. मेरा प्यार किराए के घर पर नहीं.. अपने घर आए...
धरा - और ये नाम... प्यार का मौसम..
पार्थ - हाहाहाहा...इसी नाम के साथ मम्मी ने मुझे जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया..
धरा - मुझे भी तो ... लेकिन ये रंग.. सजावट... धरा प्रश्नवाचक नेत्र से पार्थ को देखती है??
पार्थ - सब तुम्हारी पसंद का कैसे..यही ना.. सौजन्य मम्मी.. तुमसे बातों बातों में पूछकर मुझे धीरे धीरे समझाती थी....
धरा - तभी इतनी धीरे धीरे माँ बेटे की बातें होती थी... और मैं क्या समझती थी..
पार्थ - क्या समझती थी तुम...
धरा - कुछ नहीं कहकर... भाव विह्वल होकर पार्थ के गले लग जाती है और माँ को फोन करने कहती है..
पार्थ - माँ धरा बात करना चाहती है...
माँ - (धरा से) कैसा लगा घर बेटा और शरारत भरी आवाज में पूछती हैं और नाम कैसा है घर का...
धरा - बहुत बहुत सुन्दर माँ.... पर आप दोनों के बिना प्यार का मौसम अधूरा है माँ... जहाँ परिवार.. वही प्यार का हर मौसम...
बस जल्दी से आ जाइए और प्यार के मौसम को अपने स्नेह बंधन से परिपूर्ण कर दीजिए....
आरती झा(स्वरचित व मौलिक)
दिल्ली
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