जब दिल की अंधेरी गलियों में 
लेते जन्म जज्बात
टकराते स्वार्थ और परमार्थ 
समर्पण और अधिकार में होती घमासान 
त्याग और चाहत में छिड़ती जंग 
जीवन के सुख ललचाते 
वही कोई आत्मतत्व रोकता इंसान को 
खुद मिटकर भी दूसरों को सुख देने को बोलता 
तभी उठता है बड़ा तूफान 

इन तूफानों में 
कश्ती मन की डगमगाती कई बार 
समझ न आती राह
सच्चाई की राह नहीं आसान 
बाहर ही नहीं
भीतर के तूफानों से होता आदमी दो चार 

हम तो मनुष्य 
कौन बचा दिल के तूफानों से 
क्या राम, क्या श्याम 
क्या खुद भगवान 

मनुष्य ही भगवान 
वही शैतान 
जब आत्मा को बना नाविक मन की कश्ती का 
कश्ती डगमगाती जरूर 
पर निकाल ले जाता तूफ़ान से
वही बन जाता भगवान 

तूफानों से निकाल कश्ती 
खुद को न जिया जो इंसान 
कब जीता उन तूफानों से 
तूफान तो उमड़ते हर रोज
रोते राम सिय की याद में 
तड़पते श्याम राधा के प्यार में 

कभी उठा तूफान 
राजा शुद्धोधन की संतान 
राजकुमार चला गया दूर
छोड़ पिता, भार्या, पुत्र 
कब बच पाया तूफान से 
सोचता तो होगा ही 
मैं कहकर आता 

रत्ना परम सुंदरी 
प्रेम में बाबरा पति 
तूफान तो उठा ही था मन में 
रोका भी था मन की कमजोरी ने 
मत चेता सुप्त को 
चेता ही दिया 
तुलसी को तुलसी बना दिया

दिल के तूफानों से 
कौन बचा आजतक
सही क्या, क्या गलत 
सब सही, सब गलत 
सीता राम का विरह 
राधा कृष्ण की दूरियां 
हम क्या समझें 
हम आम इंसान 
हमारी तो कश्ती ही डूबती कई बार 
ऐसे ही तूफानों में 
वे जीत दिल का तूफ़ान 
बढे कर्तव्य की राह 
विजेता तूफ़ानों के 
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'