दोनों भाइयों की स्त्रियों में विवाद ज्यादा गहरा गया। दिन रात की चिकचिक। किसने कितना काम किया। मैं कोई नौकरानी थोङे ही हूं। मेरा मर्द दिनभर काम करता है और तुम सब उसपर अय्याशी करते हो। अलग हो गये तो सब आटा दाल का भाव पता चल जायेगा। और एक दिन दोनों भाइयों में बटबारा हो गया। अंदर की बात यह थी कि औरतों का नाम लिया जा रहा था। खुद दोनों भाई भी साथ रहने को तैयार नहीं थे।
पंचों ने खेत, घर, आंगन, एक एक बर्तन, और कर्तव्यों का भी बटबारा कर दिया। घर में एक दीवार खङी हो गयी। पङोसियों को लगने लगा कि अब कलह का स्वर घर से नहीं आयेगा।
बटबारा हुए दो ही दिन हुए थे। घर से बहुत शोर आ रहा था।
बङी बहू सास पर हावी हो रही थी। आखिर घर की रसोई से हलवा ससुर को कैसे दिया। बटबारे में सास बङे के पास थी और ससूर छोटे के पास।
छोटी बहू भी ससुर को सुनाने में कम नहीं पङ रही थी। अगर हलबा खाना है तो काम करना होगा। डोकरी तो जिठानी के साथ घर के काम निपटाती है। मैं कोई धन्ना सेठ नहीं हूं। एक तो बटबारे में ससुर मिल गया। न घर पर कोई काम कर सकता और न खेत में। ऊपर से घर की सूखी दाल रोटी इससे खबती नहीं। बङी की रसोई से हलवा खाकर हमारी नाक कटवा रहा है।
दोनों बेटों की हिम्मत स्त्रियों को रोकने की न थी। और बात भी सही है। अपने अपने में खुश रहो। पंच भी बूढ्ढे बुढिया को दोष दे रहे। बूढे दंपत्ति की आंखें बरबस पूछ रहीं थीं कि अग्नि के सात फेरे लेकर जीवन पथ पर चलने बाले हमारा बटबारा करने का तुम्हें क्या हक। पर बोल न सके। शरीर से पहले ही मजबूर थे। खुद को बटबारे की शर्तों में ढालने की कोशिश करने लगे।
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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