बंद हैं सभी दरवाजे, कोई दिखता नहीं हैं
लगता है अब यहां कोई, रहता नहीं है।
आज कल यहां पहले सी, रौनक भी नही है
घरों में बंद सब है, कोई दिखता नहीं है।
अनदेखे से इक जीव ने, सबको डरा दिया
करोड़ों की जीविका को, ताला लगवा दिया।
हर जगह है ये दुश्मन, मगर दिखता नहीं है
अब आदमी भी आदमी को, भाता नहीं है।
अतिथि रूप है भगवान का, ये सबको खबर है
घर अपने कोई किसी को, बुलाता नहीं है।
गांव भी सूने सूने से, हैं शहर भी सूने
शमशान में लोगों की देखो, भीड़ लगी है।
मंदिर भी बंद देखो, मस्जिद भी बंद हैं
अस्पतालों में लोगों का,मेला सा लगा है।
गलियां भी अब तो लगतीं हैं, कितनी अजनबी
लगता है कि अब कोई यहां, आता नहीं है।
खुशी हो या गम, कोई कहीं जाता ही नहीं है
लगता है किसी को, कोई जानता ही नही है।
अपने भी अपनों से अब , दूर हो गए
वक्त के हाथों सभी, मजबूर हो गए।
अपना सा अब कोई कहीं, दिखता नहीं है
लगता है अब यहां कोई, रहता नहीं है।
कविता गौतम✍️

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