प्रस्तावना : विश्व के अधिकांश सभी धर्मों में एक सामान्य मान्यता है कि जैसे संसार का निर्माण हुआ है, उसी तरह संसार का अंत भी होता है। ऐसी मान्यता को लेकर हर धर्म में कुछ अलग कहानी है। मान्यता यह भी है कि दुनिया नष्ट होने के बाद भी कुछ ऐसी व्यवस्था रह जाती है कि फिर से सृष्टि की उत्पत्ति हो सके। 

    अपोकलीप्स फिक्सन कहानी कहानी लेखन की ऐसी ही विधा है। इसमें कल्पना की जाती है कि किस तरह दुनिया का अंत हुआ तथा अंत के बाद भी दुनिया किस तरह दुबारा बनेगी। पुनः सृजन का यज्ञ इसी विधा में लिखी कहानी है। जिसका किसी भी घटना या मान्यता से कोई संबंध नहीं है। 

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   दुनिया के सभी देशों में अफरा-तफरी का माहौल था। पर अधिकांश दुनिया के लिये अपरिचित बुढांऊ (काल्पनिक नाम) में रोज उत्सव मनाये जा रहे थे। उत्तरी अमेरिका महाद्वीप में स्थित बुढांऊ को वैसे स्वतंत्र राज्य का दर्जा भी नहीं मिला था। बुढांऊ संयुक्त राष्ट्र अमेरिका का एक द्वीप था। पर बुढांऊ की जनता खुद को अलग मानती थी। अमेरिका ने भी कभी बेबजह ऐतराज नहीं दिखाया। बुढांऊ का एक राजा था जो वंश परंपरा से चुना जाता था। कुछ आठ दस लाख आवादी व पंजाब से भी कम क्षेत्रफल बाले बुढांऊ का अधिकांश भाग जंगलों से ढका था। कुछ भाग में आदिवासी रहते थे। जंगलों से शहद इकट्ठा करना और शिकार करना उनकी आजीविका थी। 

   बुढांऊ के राजकुमार शु चूनी का पूरा नाम शुभहाइमन आर्गन चूनी था पर पूरा नाम न लेकर उसे शु चूनी ही कहेंगें। ज्ञान पर कभी भी किसी खास वर्ग का एकाधिकार नहीं होता है। विद्यालय ज्ञान के रूप में अक्षर ज्ञान से भी अपरिचित शु चूनी पर माता सरस्वती की खास कृपा थी। वह तो खुद को एक वैज्ञानिक ही समझता था। खासकर जीव विज्ञान व चिकित्सकीय विज्ञान पर शु चूनी की खास पकङ थी। अनेकों पेङों का औषधीय प्रयोग शु चूनी को ज्ञात था।

    न्यूयार्क में जीव वैज्ञानिकों व डाक्टरों की एक गोष्ठी आयोजित हुई। खुद को दुनिया के समक्ष साबित करने का खास मौका था। शु चूनी भी उस गोष्ठी में आ गया। पर एक अनपढ आदिवासी को गोष्ठी में देख पढे लिखे डाक्टर नाक और मुंह सिकोड़ने लगे।

   " इस अनपढ, जंगली को बाहर निकालो।" दुनिया की अनेकों भाषाओं में यही बात गोष्ठी में गूंज रही थी।

  भारत के डाक्टर हर्ष चंद्र न केवल ज्ञान में श्रेष्ठ थे अपितु बहुत सज्जन व्यक्ति थे। ऊंच नीच की भावनाओं से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था। एक आदिवासी का अपमान उन्हें ठीक नहीं लगा।

   " महान लोगों। किसी की वेषभूषा से उसका अपमान करना ठीक नहीं है। ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती है। आपको ज्ञात होगा कि महान वैज्ञानिक न्यूटन ने भी एक बढई से ज्ञान प्राप्त किया था। संभव है कि जैसा यह कह रहा हैं, इसे भी जंतुओं और वनस्पतियों का ऐसा ज्ञान हो जिसकी दुनिया को जरूरत हो। एक बार इनकी बात सुनने में हर्ज ही क्या है। "

   पर सच्चाई अलग थी। सभी वैज्ञानिकों को भी गोष्ठी में बोलने का मौका नहीं मिलेगा। अनेकों जूनियर वैज्ञानिक तो गोष्ठी को सुनकर अपना ज्ञान ही बढायेंगें। पर शु चूनी को अपमानित कर बाहर करने को कहीं से भी सही नहीं ठहरा सकते।

  कुछ ही दिनों बाद अमेरिका में एक अज्ञात बीमारी ने पैर पसार लिया। सरकारी इंतजाम नाकाफी थे। कोई इलाज समझ नहीं आ रहा था। एक देश से दूसरे देश में बीमारी बढती गयी और पूरी दुनिया अज्ञात बीमारी की चपेट में आ गयी।

   ईर्ष्या व द्वेष में भरा इंसान कुछ भी पाप कर सकता है। वास्तव में पाप और पुष्य का विचार उसके मन में नहीं रहता। पूरी दुनिया को तहस नहस करने बाली बीमारी का वायरस खुद शु चूनी ने इजाद किया था। बुढांऊ के हर नागरिक को उसने स्वनिर्मित दवाई पिला दी थी। खुद के ज्ञान पर शु चूनी को ज्यादा भरोसा था। दुनिया में रोज लाखों मौत हो रहीं थीं और बुढांऊ का राजकुमार रोज नये उत्सव मनवा रहा था। दुनिया भर में इंसानों की मौत पर शु चूनी हस रहा था। पर अहंकार कभी भी किसी का नहीं रहता। जिस दिन बुढांऊ का पहला नागरिक अज्ञात बीमारी की चपेट में आया, ढोलों पर दी जा रही थाप रुक गयी। शु चूनी की हसी गुम हो गयी। उस आदमी को बचाने में शु चूनी का सारा ज्ञान असफल रहा। थोङे ही दिनों में बुढांऊ के हर घर में रोना हो रहा था। राजकुमार शु चूनी लापता था। सत्य तो यह है कि वह अपनी गलती सुधार सकने की काबिलियत रखने बाले को तलाश रहा था।

   ईश्वर के नाम अनेक हैं पर सत्य में ईश्वर एक ही है। शु चूनी आदिवासियों के देवता को अलग अलग तरह से मनाकर राह पूछ रहा था। पर देवता ऐसे नाराज थे कि मन ही नहीं रहे थे। अक्सर जब आदिवासी देवता की आराधना करके शिकार खेलने जाते थे तो उनके मन में देवता की स्पष्ट आवाज सुनते थे। उसी हिसाब से शिकार करते और सफल भी होते। आज शु चूनी अपनी भूल सुधार के लिये मार्ग पूछ रहा था तो देवता चुप थे। इतने बङे अपराध पर देवता की नाराजगी जायज थी। पर शु चूनी ने एक लगभग असंभव कर्म का वास्ता देवता को दिया तो देवता को अपनी नाराजगी भूलनी पङी।

   " आदिवासियों के देव। यदि यह सत्य है कि मैं नूरी से बहुत प्रेम करता हूं । फिर भी अपने प्रेम को अपने मन में रख मेने नूरी का विवाह उसके प्रेमी से कराने में बङी भूमिका निभायी। आज भी नूरी के अतिरिक्त अन्य किसी लङकी से मैं प्रेम नहीं करता। नूरी का विरह ही मुझे विज्ञान के करीब लाया है, तो मुझे राह दिखायें। "

   " भारत के मुंबई शहर के डाक्टर हर्ष चंद्र " शु चूनी को अपने अंतर्मन में देवता का स्पष्ट संदेश सुनाई दिया।

    शु चूनी को भारत आने व डाक्टर हर्ष चंद्र को तलाशने में जो मेहनत लगी, उसका जिक्र न करना ही ठीक रहेगा। इस पर तो शायद पूरी एक कहानी लिख जाये।

    " डाक्टर। दुनिया का गुनहगार मैं हूं। दुनिया को खत्म होने की कगार पर मेने ही पहुंचाया है। पर आप ही दुनिया को बचा सकते हैं। मेरे देवता का यही निर्देश है। मैं आपके समक्ष हाथ जोङता हूं। कृपया दुनिया को बचा लीजिये।" वैसे शु चूनी ने डाक्टर से ये सारी बातें अपनी आदिवासी जुबान में कीं जिसके बारे में डाक्टर हर्ष चंद्र को कुछ भी पता नहीं था। पर जब दैवीय शक्तियां किसी से कुछ कराना चाहती हैं तो ऐसे ही चमत्कार होते हैं। डाक्टर हर्ष चंद्र पहले से ही वायरस पर बहुत शोध कर चुके थे। पर वायरस बनाने का तरीका पता चलते ही उन्हें वायरस का टीका बनाने की राह मिल गयी। इसी बीच शु चूनी भी अज्ञात बीमारी से दुनिया छोड़ गया। सत्य तो यह है कि उसका काम पूरा हुआ।

    दिन रात मेहनत करके वायरस का टीका तो बन गया पर डाक्टर हर्ष चंद्र देख रहे थे कि अब कुछ भी आसान नहीं है। दुनिया में हर रोज करोड़ों लोग मर रहे थे। वैसे भी जब वह वायरस पर अध्ययन कर रहे थे, उस समय भी अक्सर बाहुबली नेताओं की धमकियां उन्हें मिलतीं थीं।

   " डाक्टर। जल्द से जल्द बीमारी का इलाज ढूंढ। कोई टीका बना। और हाॅ.. सबसे पहले मुझे टीका लगना चाहिये।"

   विदेशी एजेंसियां भी डाक्टर हर्ष चंद्र से संपर्क करती थीं। उनकी बातों में भी धमकी ही अधिक होती थी।

" डाक्टर.. ।दुनिया के अन्य कई डाक्टरों के साथ तुम भी बीमारी पर अध्ययन कर रहे हो। यदि निदान मिले तो हमारे देश को फार्मूला दे देना। यदि हमारी बात मानी तो मालामाल हो जाओंगे। नहीं तो तुम्हें गायब करने में कितनी देर लगेगी। आज तक वैज्ञानिक भाभा की गुमशुदगी पर भारत की सरकार चुप है। "

   डाक्टर हर्ष चंद्र भी टीका बनाने के बाद धर्म संकट की स्थिति में थे। अंत में उन्होंने कुछ अलग ही निश्चय किया। अब दुनिया तो नष्ट होगी ही पर संभव है कि पुनः सृजन की तैयारी करना। केवल अग्नि में घी चढाना ही यज्ञ नहीं है। डाक्टर हर्ष चंद्र पुनः सृजन यज्ञ के लिये गायब हो गये। डाक्टर की गुमशुदगी को शक्तिशाली देशों का काम माना जा रहा था। दूसरी तरफ शक्तिशाली देश भी अपनी ऐजेंसियों पर नाराज थे। देश और अन्य कई शक्तिशाली देश भी डाक्टर हर्ष चंद्र को तलाश रहे थे।

    कभी कभी सुनाई दे जाता डाक्टर हर्ष चंद्र ने किसी स्थान पर युवा पति और पत्नी को टीका लगाया है। डाक्टर की राय यही थी कि जो युवा हैं, जिन्हें कोई बीमारी नहीं है, जो पुनः सृजन में सक्षम हैं, उनको ही टीका लगाना सही है। बुजुर्गों और रोगियों को टीका लगाना वास्तव में पुनः सृजन के यज्ञ को कमजोर करना ही है। बिना धर्म, समाज, संस्कृति में भेद किये डाक्टर अलग अलग देशों में अलग अलग संस्कृति के युवक नीरोगी जोंङों को टीका लगाते। डाक्टर हर्ष चंद्र रोज ईश्वर से प्रार्थना करते कि दुनिया के अंत के बाद भी उनके द्वारा टीका लगाये युवा जोङे बच जायें। फिर से नयी सृष्टि को जन्म दें। अपनी अपनी संस्कृति और विश्वास को जिंदा रखें। बढती आयु के कारण डाक्टर हर्ष चंद्र ने खुद को भी टीका नहीं लगाया। डाक्टर हर्ष चंद्र का पुनः सृजन का यज्ञ तब तक चला जब तक कि वह खुद बीमारी की चपेट में न आ गये। इतने कम समय में दुनिया भर में कई हजार युवा जोङों को टीका लगा चुके थे। पूरी दुनिया में रोज मरने बालों की संख्या बढकर सौ करोड़ तक हो चुकी है पर डाक्टर हर्ष चंद्र ने जिन युवा पति और पत्नी को टीका लगाया है, वे बीमारी से बचे हुए हैं। दुनिया को पुनः सृजन का डाक्टर हर्ष चंद्र का यज्ञ कितना सफल होगा, यह तो भविष्य ही जाने। 
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'