बचपन का भिक्षुक अनिमेष अब युवा संन्यासी हो चुका था। लेकिन अभी वो कंचन कामिनी से बहुत दूर था, कुशाग्र बुद्धि का था।
अब उसे बौद्ध धर्म की शिक्षा का प्रचार प्रसार करना था।
एक दिन अनिमेष भिक्षा के लिए एक घर में गया, वहां एक सुंदर युवती भिक्षा देने निकली,उसके रूप को देख अनिमेष अपलक देखता रह गया।
अब तो उसका रोज़ का नियम हो गया ,किसी ना किसी बहाने ,वह उस घर के पास पहुंच ही जाता।युवती भी उसके उन्नत माथे,चौड़े सीने ,और चेहरे पर ओज पर प्रभावित बिना नहीं रह सकी।आकर्षण दोनों ओर था ,इसलिए मुलाकातें शुरू हो गई।
अब अनिमेष अपने राह से भटक चुका था।
चैताली का जादू उसके सर चढ़ बोल रहा था।
एक दिन चैताली ने अनिमेष से कहा _" प्रिए, मेरी राजपरिवार की सहेलियां है, उनके पास अच्छे अच्छे कपड़े ,और जवाहरात है, मुझे भी तुम उनके जैसे कपड़े ,गहने ला दो।
तुम तो इतने शिक्षित हो,किसी भी राजा से अपनी विद्वता का लोहा मना, कुछ भी मांग सकते हो।
अनिमेष ,चैताली के प्रेम में, वैशाली के राजा के पास पहुंचा ।राजदरबार में राजा ने उसका सत्कार किया,ऊंचे आसन पर बिठाया।
राजा की जिज्ञासा बौद्ध धर्म को लेकर थी।
अनिमेष से, राजा प्रभावित हुए।
अंत में उन्होंने अनिमेष से कुछ मांगने को कहा।
अनिमेष ,चैताली के साथ अपनी पूरी जिंदगी बिताना चाहता था,इसलिए उसने सोचा कि - "धन दौलत क्या मांगा जाए,क्यों ना राज्य मांग लिया जाए।"
यह सोच उसने राजा से राज्य मांग लिया,सभी राज्यसभा में मौजूद दरबारी हतप्रभ हो गए।
पर राजा मुस्कुराने लगे," उन्होंने कहा - अहोभाग्य,- अब मैं आपको अपना राज्य सौंप आराम से बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करूंगा।
और राजसिंहासन से उतर गए।तभी अनिमेष जैसे नींद से जागा ,"ये क्या अनर्थ करने जा रहा था वह,जो कार्य गुरु ने उसे दिया था ,वह पथभ्रष्ट हो चुका था।
उसने राजा से क्षमा मांगी और ,वैशाली से बहुत दूर चला गया।
उसने फिर कभी मुड़ कर भी चैताली कि सुध भी नहीं ली।
लोगों को कहना था कि ,वह फिर कभी किसी राज्य में रुका ही नहीं ,लगातार , बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए चलता ही रहा।
जीवन में भटकाव के बहुत अवसर आते हैं,जब लोग अपने लक्ष्य से दूर हो जाते हैं,सही शिक्षा और ईश्वर में आस्था ही उनका पथ प्रशस्त करती है।

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