बड़े बड़े तैराक बहुधा बहुत उथले पानी में डूबने लगते हैं। वास्तव में पानी की गहराई का सही अंदाजा अनेकों बार गलत हो जाता है। स्वच्छ पानी की गहराई बहुधा बहुत कम लगती है। तभी गहराई में भी उथलेपन का भ्रम होता है।
वीरता के बारे में भी अनेकों बार ऐसा ही हो जाता है। अनेकों बार जिनकी वीरता के जयनाद से धरती और आसमान गूंजते रहे हों, वे महावीर भी बहुत कमजोर जैसे योद्धाओं के सामने कमजोर पड़ने लगते हैं। वास्तव में तो वीरता का दंभ भरने बाले शूरवीर बहुधा विपक्षी के आत्मबल की सही थाह नहीं पा पाते।
चंपकपुरी के योद्धाओं का कभी बहुत नाम नहीं सुना था। अर्जुन को यही लगा कि जोश जोश में इन्होंने यज्ञ अश्व को बांध लिया है। खुद अर्जुन युद्ध का नैत्रत्व ही करने नहीं आये। पर सहदेव सहित पांडवों की सेना को सेनापति सुदर्शन ने ही खदेड़ दिया। अर्जुन समझ गये कि कभी भी रण में विपक्षी को कमजोर नहीं समझना चाहिये। फिर भी चाहकर वह चंपकपुरी के वीरों को खुद के समकक्ष समझ नहीं पाये।
महाभारत के रण में जिन्हें दुर्योधन भी अपराजित कहकर बुलाता था, जिनकी वीरता की गाथा खुद कर्ण भी सुनाता था, जिन्होंने महाभारत के रण में अर्जुन की बराबरी के योद्धा कर्ण को भी हराया था, वृण्टिवंश का वह सेनानी और अर्जुन का शिष्य सात्यकि भी चंपकपुरी के बड़े राजकुमार विक्रांत के हाथों पराजित हो गये।
अकेले ही संभरासुर को उसके सारे पुत्रों सहित युद्ध में मार गिराने बाले, अनेकों मायावी विद्याओं के जानकार कामदेव के अवतार प्रद्युम्न रण में भक्त राज सुधन्वा से हार गये। आखिर युद्ध में खुद अर्जुन आये। सामने एक बालक को देख उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि इसी बालक ने परमवीर प्रद्युम्न को युद्ध में हरा दिया है। उस वीर बालक ने उनके मन को मोह लिया।
अभिमन्यु भी जब धरती को छोड़कर गया था तब बालक ही था। अपनी वीरता के बलबूते असंभव को भी वह संभव कर गया था। काश किसी वीर ने उस समय जरा समझदारी का परिचय दिया होता। काश उस समय अधर्म न हुआ होता। काश उस समय बालक पर बड़ो का प्रेम मिल जाता। कम से कम गुरु द्रोणाचार्य और कृपाचार्य से तो ऐसी उम्मीद न थी। कर्ण के विषय में भी ऐसा अनुमान न था।
आज जब अर्जुन के समक्ष एक युवक योद्धा युद्ध के लिये खड़ा था तब उनका मन उसी भावना से डोलने लगा कि मानों सामने अभिमन्यु ही दूसरा रूप रखकर खड़ा हो। वह सुधन्वा को समझाने लगे।
" अरे बेटा। तुम तो बहुत छोटे हों। अभी तो तुम्हारे खेलने खाने के दिन हैं। वैसे भी हमारी और आपकी कोई दुश्मनी तो है नहीं। यदि युद्ध ही करना होगा तो मैं किसी बराबरी बाले से करूंगा। तुम अपने घर जाओ।"
पर सुधन्वा भी कोई कम जिद्दी न था। वैसे भी बालहठ प्रसिद्ध है। सुधन्वा न केवल वीर था अपितु भगवान श्री कृष्ण का परम भक्त भी था।
" आदरणीय। आप जानते ही हैं कि तेजस्वियों की आयु नहीं देखी जाती है। क्षत्रिय वही है जो हमेशा यमराज से भी टक्कर लेने को तैयार रहे। वैसे हम भी शांति के ही उपासक हैं। हमने आरंभ में भी यही कहा था कि हमें आपसे और आपके अश्व से कोई प्रयोजन नहीं है। आप हमारे आराध्य भगवान श्री कृष्ण को बुला दें। बस इतना ही तो आपसे निवेदन किया था। पर सत्य यह भी है कि आप हमसे युद्ध में तो अश्व जीत नहीं सकते। "
कुछ समय पूर्व जिस युवा में अर्जुन को अपने पुत्र की छबि दिख रही थी, अब वह उद्दंड बालक दिखने लगा। ऐसा धूर्त बालक जो बिना भय दिखाये हटेगा नहीं। हालांकि अर्जुन भूल रहे थे कि इसी बालक ने कुछ समय पूर्व ही प्रद्युम्न को युद्ध में हराया है।
गाडीव से छोड़े गये अर्जुन का कोई भी तीर वीर सुधन्वा के पास तक पहुंच नहीं पाया। एक अद्भुत वीरता और तीर छोड़ने की क्षमता सुधन्वा में थी। महारथी अर्जुन के हर तीर सुधन्वा के तीरों से कट रहे थे। जबकि अर्जुन का धनुष गांडीव दिव्य था।
महाभारत का रण अर्जुन ने अपने दिव्य रथ नंदीघोष पर बैठकर किया था। उस रथ के सारथी खुद भगवान श्री कृष्ण थे। इसीलिये भगवान श्रीकृष्ण पार्थसारथी नाम से भी विख्यात हुए। आज वह नंदीघोष तो नहीं था। महाभारत के रण की समाप्ति के बाद ही अग्नि देव ने वह दिव्य रथ ले लिया था। फिर भी इस बात की कल्पना करना भी असंभव था कि संसार का कोई भी योद्धा जिस रथ पर अर्जुन सवार हों, उसकी पताका काट सकता है। आज असंभव भी संभव हो गया । अर्जुन के रथ की पताका टूट कर अलग गिर गयी। मानो वह पताका अर्जुन का उपहास उड़ा रही हो। कह रही हो कि अर्जुन... ।भले ही आपने बहुत सारे वीर देखे होंगें। पर सुधन्वा जैसा नहीं देखा होगा। आप इसका सामना अकेले कर सकते हैं। नहीं बिलकुल नहीं। अपने उन्हीं सारथी को बुलाइये जिनके हाथों में अपने रथ सोंपकर आपने महाभारत का रण जीता था । तभी इनका सामना कर सकते हों।
अर्जुन ने एक क्षण कटी पताका को देखा और फिर से गांडीव से तीरों की बारिश शुरू कर दी। मानों कि वह अभी भी सुधन्वा को इतना बड़ा वीर मान ही नहीं रहे हों कि उसके लिये भगवान श्री कृष्ण को याद किया जाये। अर्जुन को लगा कि तीरों की बारिश में वह युवा योद्धा मारा ही गया होगा। मन ही मन एक दुख की अनुभूति फिर से हुई। वही जो उन्हें अभिमन्यु के वध बाले दिन हुई थी। पर दोनों दिनों में कुछ अंतर भी था। अर्जुन को लग रहा था कि आज उन्होंने खुद अपने ही हाथों अपने पुत्र का वध किया हो।
मनुष्य का मन अच्छाई और बुराई का संगम कहा गया है। पल पल में इसकी प्रवृत्ति बदलती है। अभी जिसकी मृत्यु का शोक मन मना रहे थे , थोड़ी ही देर में सत्य ज्ञात होते ही ईष्र्या ने अपना रूप दिखा दिया। अर्जुन द्वारा छोड़ी वाण वर्षा की काट कर्ण के पास भी न थी। पितामह भीष्म ऐसी ही एक वर्षा में धराशायी हुए थे। पर सुधन्वा सारे तीरों को काट एकदम सुरक्षित खड़ा था।
थोड़ी ही देर में अर्जुन के रथ का छत्र टुकड़े टुकड़े हो गया। अर्जुन का सारथी भी मारा गया।
" शक्ति के बिना कौन शक्तिवान। महावीर। आप फिर से भूल रहे हैं। आपकी शक्ति तो आपके सारथी थे। पर अब वह कहाॅ हैं।"
अर्जुन इस अवस्था में तो आ गये कि वे अपने आराध्य को सहायता के लिये याद कर सकें। अर्जुन भगवान श्री कृष्ण को याद करने लगे। दूसरी तरफ चंपकपुरी के वीर आनंद में शंख और नगाड़े बजाने लगे। भक्त सुधन्वा ने सभी चंपकपुरी वासियों का मान रख दिया। अर्जुन की प्रार्थना पर भगवान श्री कृष्ण जरूर आयेंगे।
महाराज हंसध्वज ने जिस उद्देश्य के लिये अलग इतना बड़ा उपक्रम किया, वह पूर्ण होने बाला है। वैसे तो भगवान श्री कृष्ण के आगमन के साथ ही रण समाप्त हो जायेगा। महाराज हंसध्वज भगवान श्री कृष्ण को आदर के साथ नगर ले जायेंगें। उनकी पूजा करेंगे। फिर यज्ञ का अश्व उन्हें दे देंगें। पर क्या यह संभव है कि हमेशा जो चाहा जाये, वही हो जाये। अनेकों बार कहानी का आरंभ ही उसी विंदु से होता है जबकि कहानी का अंत हो चुका हो।
अर्जुन के स्मरण के साथ ही मन के वेग के बराबर गति रखने बाले चार घोड़े युक्त गरुणध्वज पर आरूण भगवान श्री कृष्ण के आगमन के साथ ही दोनों सेनाओं के मध्य भगवान श्री कृष्ण की जयनाद के स्वर गूंजने लगे। रण की समाप्ति के ठीक समय भाग्य का एक और रण आरंभ होने बाला था। जिसका अनुमान भी किसी को न था। अभी तक अस्त्र विद्या का युद्ध सुधन्वा और अर्जुन के मध्य चल रहा था। जिसमें निश्चित ही सुधन्वा श्रेष्ठ रहा। अभी भी एक रण शेष था। वह था दो भक्तों की भक्ति का रण। निश्चित ही जो भगवान श्री कृष्ण के नाम का स्मरण करते हुए गर्म तेल में जीवित बचा रहा, वह सुधन्वा इस रण में भी किसी भी स्थिति में अर्जुन से कम तो नहीं पड़ेगा।
क्रमशः अगले भाग में।
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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