हम औरतों की जिंदगी में घर की कितनी अहमियत है यह हमें बचपन से ही बता दिया जाता है । हमें अपने जीवन-यापन के लिए एक घर की छत चाहिए जो हमें दी तों जरूर जाती है लेकिन समय - समय पर हमें इसमें रहने की क़ीमत भी चुकानी पड़ती है । कभी शारीरिक कीमत तों कभी मानसिक ...
मैं भी एक औरत हूॅं तों मुझे भी तो यह कीमत कभी - ना - कभी चुकानी ही थी । हाॅं तों मैं बात कर रही हूॅं खुद की । मैं सुगंधा सिंह या यूं कह सकते है सौरभ सिंह की पत्नी ... हाॅं मेरी यही तों पहचान है । कुछ और पहचान है जिससे मुझे लोग जानते है जैसे कि सुधीर सिंह की बहू , आदित्य और गौरी की माॅं आदि ।
हम जब लड़कियां रहती है तो अपने पिता के नाम से जानी जाती हैं । यह और बात है कि हमें घर के सदस्यों या दोस्तों द्वारा हमारे स्वयं के नाम से भी जाना जाता हैं और कुछ हद तक हमारी यह पहचान भी होती है लेकिन शादी के बाद तों हमारा यह नाम भी हमें तभी सुनने को मिलता है जब हम मायके जाते हैं या हमारे मायके से कोई आता है और हमें हमारे नाम से बुलाता है ।
ससुराल में तों मैं अपनी ननदों और देवर के लिए भाभी थी । सास - ससुर के लिए दुलहिन थी और अपनों बच्चों के लिए माॅं । पति भी अपनों बच्चों के नाम लेकर उनमें माॅं जोड़ कर ही बुलाते । अपना नाम सुनने के लिए तरस जाती हूॅं मैं तों ।
जब छोटी थी एक बार मैंने बातों ही बातों में कहा था कि यह मेरा घर है । पापा-मम्मी तुरंत ही समझाने के लिए बैठ गए थे और बड़े ही प्यार से समझाया था कि बेटा ! यह तुम्हारा घर नहीं बल्कि मेरा और तुम्हारे भाई का घर है । जब तुम पढ़ - लिख जाओगी , तुम्हारी शादी जहां होगी वह तुम्हारा ससुराल होगा और वही तेरा घर होगा । मेरी समझ में उनकी बातें नही आई । उम्र भी तो महज आठ - नौ साल रही होगी । आठ - नौ साल के बच्चों को क्या समझ कि ये तेरा घर ... ये मेरा घर । मुझे तों ये घर .. घर की बातें ही अजीब लग रही थी । मुझे जब यह तेरा और मेरा घर समझ नहीं आया तो मैंने उनसे पूछा कि यह घर मेरा घर क्यों नहीं है ?
मम्मी - पापा ने फिर से वही बातें दुहराई और कहा कि मेरा ससुराल ही मेरा घर होगा । उनके समझाने का प्रयास कितना सफल और कितना असफल हुआ यह तों मैं नहीं जानती लेकिन उनके समझाने पर मैंने आखिरकार मान ही लिया कि मेरा ससुराल ही मेरा घर होगा ।
मेरी उम्र शादी लायक हुई तो मेरी शादी एक भरे - पूरे और इज्जतदार घराने में हो गई । मैं अब ससुराल में थी और जैसा कि मम्मी - पापा ने कहा था कि यही मेरा घर है मैंने भी इसे अपना घर मान लिया और साथ ही घर के प्रत्येक सदस्य को भी अपना बनाने की कोशिश में लग गई ।
समय बीता । सब कुछ ठीक चल रहा था । मेरे घर के लगभग हर सदस्य मुझसे खुश थें क्योंकि मैं प्रत्येक सदस्य की खुशी का ख्याल रखने की पूरी कोशिश करती थी । एक दिन मैंने अपनी खुशी और सहुलियत के हिसाब से मेरे घर में कुछ बदलाव किए जिसे देखकर मेरी सासू माॅं बिगड़ गई और मुझे सुनाने लगी कि यह बदलाव करने से पहले मैंने उनसे पूछा क्यों नहीं ?
मैंने उनसे सिर्फ एक ही सवाल पूछा कि क्या यह मेरा नही ? उनका जवाब सुन मेरी ऑंखों में ऑंसू आ
गए । उनके जवाब ने मुझे मम्मी - पापा द्वारा कहें शब्दों की याद दिला दी । मैं समझ गई कि यह मेरा घर नही बल्कि उनका घर है और उनकी मर्जी के बिना एक पत्ता भी इधर से उधर नही किया जा सकता ।
समाज की नजर में मेरा घर तो यही है लेकिन क्या सचमुच यह मेरा घर है ? क्या अपने घर में मैं अपनी खुशी के लिए कुछ बदलाव नही कर सकती ? क्या यही मेरा घर है ? इस जैसे कितने ही सवाल मेरे अंतर्मन में आ रहें थे जिनके जवाब मुझे नही मिल रहें थे ।
मैं अब पचास से ज्यादा की हों चुकी थी और मेरी सासू माॅं भी बूढ़ी हो गई थी । कभी भी ऊपर से बुलावा आ सकता था लेकिन इस उम्र में भी उनके घर में उनकी ही चलती थी । उनके बेटे यानी मेरे पति श्रवण कुमार से कम नहीं थे । काश! मेरे दोनों बेटे भी अपने पिता की भांति ही मातृभक्त होते लेकिन सबकी किस्मत एक जैसी कहाॅं रहती है ?
एक दिन सासू माॅं का बुलावा आ गया और वह हम सबको उनके अपने घर में छोड़ कर परलोक सिधार गई । श्राद्ध - कर्म से निवृत्त होकर मेरे मन को खुशी मिली कि चलों ! यह अब मेरा घर है । मैं अब जो चाहे घर में बदलाव कर सकती हूॅं लेकिन मेरी यह खुशी क्षणिक थी । जैसे ही मैंने अपने मनमुताबिक कुछ बदलाव किए । पतिदेव सौरभ सिंह बिगड़ गए और बोलने लगे कि माॅं को गुजरे कुछ ही दिन हुए है और इन्हें पहले की तरह बदलाव करना है । कुछ बदलाव नही होगा । यह माॅं का घर था और हमेशा ही उनका ही रहेगा । साथ ही मेरे कानों ने यह भी सुना कि कुछ भी बदलाव नहीं होगा ताकि मेरे पतिदेव को उनकी माॅं की याद उनकी चीजें देखकर आती रही ।
उस दिन के बाद से मेरी कभी भी हिम्मत नहीं हुई कि मैं कहने के लिए अपने दिल घर में स्वयं से कुछ भी कर सकूं ।
इसी तरह समय बीतता गया । अब दोनों बेटे भी बड़े हों गए थे । अब इस घर में मेरे पति और दोनों बेटे की चलने लगी । मेरी स्थिति पूर्ववत ही रही । सबकी इच्छा का मान रखना ही मेरी इस ध्येय का काम था जिसे मैं अपना कर्म समझ करती रही ।
समय के साथ बड़े बेटे की शादी हुई । मैंने अपनी चलाने की कोशिश की वह भी दूसरे रिश्तेदारों के कहने पर लेकिन मेरी जब आज तक नहीं चली तो अब क्यों मेरी कोई सुनता ?
मेरे पतिदेव और बेटे का भी साथ नहीं था मुझे । बहुएं अपने - अपने घर में रम गई । मेरे पास भगवान में रमने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचा था । मैंने अपने आप को भगवान के ध्यान में पूर्ण समर्पण करने का निश्चय कर लिया है ताकि भगवान एक दिन मुझे एक ऐसे घर में लें जाएं जहाॅं वह मुझसे कहें कि ये तेरा घर और ये मेरा घर ।
धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻
" गुॅंजन कमल " 💗💞💓

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