चंपकपुरी राज्य के बाहर पहाड़ियों की तलहटी पर मुनि शंख और लिखित का आश्रम जहाँ राज्य के सारे बच्चे अध्ययन करते। दोनों गुरु बहुत कठोर और अनुशासन प्रिय। नियमों के पूर्ण पाबंद। उनके गुरुकुल में पता ही नहीं चलता कि कौन धनी की संतान है और कौन निर्धन की। कौन राजकुमार है और कौन दास। किसी भी बच्चे को अपने पिता के कारण अहंकार दिखाने की कोई आजादी नहीं थी।

   गुरुकुल में मुनियों का साथ देने के लिये और भी शिक्षक थे। ये ज्यादातर वह ब्राह्मण पुत्र थे जिन्होंने इन्हीं गुरुओं से शिक्षा पायी थी।

  महाराज हंसध्वज के अनुरोध पर गुरुकुल में कुछ वर्षों से एक परिवर्तन हुआ था। गुरुकुल में कन्याओं का भी प्रवेश किया गया। यद्यपि इस बात की पूरी सावधानी बरती गयी कि दोनों गुरुकुलों में पर्याप्त दूरी रहे। छात्रों का छात्राओं के स्थान पर प्रवेश वर्जित था। शिक्षा के लिये बृह्मचर्य का पालन आवश्यक माना जाता था। और बृह्मचर्य के लिये छात्रों व छात्राओं के मध्य पर्याप्त दूरी। वैसे यह उन दिनों की सोच थी।

   कन्या गुरुकुल में दो क्षत्रिय कन्याएं अस्त्र शिक्षा की प्राप्ति के लिये आयी हुई थीं। गुरुओं के अतिरिक्त किसी को ज्ञात नहीं कि वे दोनों शोंधव राज की कन्याएं विदिशा और प्रभावती हैं। दो राजकुमारियां साधारण परिवार की कन्याओं की भांति रहतीं। आश्रम के बताये कार्य करतीं। तथा अस्त्र शस्त्रों का अभ्यास करती।

   गुरुओं का भय कि कभी भी छात्र कन्याओं की तरफ नहीं देखते। नजदीक से गुजरती कन्या के भी मुख का दर्शन वर्जित था। 

  दोनों मुख्य गुरु ऊपर से जितने कठोर थे, भीतर से उतने ही भावुक। पर गुरु का कर्तव्य निभाते समय भावुकता को समीप न गुजरने देते।

  नियम बद्धता क्या है। यह जानने के लिये शंख और लिखित मुनि का इतिहास जानना होगा। कभी दोनों भाई चुपचाप वनों में रहते थे। एक बार छोटे भाई लिखित ने बड़े भाई के अधिकार के फल खा लिये। बाद में उन्हें ध्यान आया कि यह तो चोरी हुई।

  फिर लिखित खुद महाराज हंसध्वज के दरवार पहुंच गये। खुद को चोरी का दंड मांगने लगे।

   दंड विधान में दंड दोनों हाथ काट देना था। लिखित मुनि ने जिद कर यही दंड स्वीकार किया।

  चोरी का दंड पाकर लिखित मुनि वापस अपने भाई के पास पहुंचे। शंख मुनि ने उनके सर पर हाथ रखा। जब लिखित मुनि जलाशय में स्नान करने उतरे तभी आचमन करते समय उनके हाथ वापस आ गये।

  जो खुद के लिये इतना नियम संबद्ध हों, उनकी नियमों के लिये कठोरता का संसार सम्मान करता है। चंपकपुरी के विकास में दोनों मुनियों का बहुत योगदान रहा है। दोनों के कठोर अनुशासन का ही परिणाम था कि राज्य के युवक अपने नियमों से कभी नहीं डिगे। एक असंभव जैसा प्रण एकपत्नी व्रत सभी निभा सके।

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  आज कन्याएं वन में अस्त्र शस्त्रों का अभ्यास करने गयीं। यद्यपि पर्याप्त सावधानी रखी गयी थी। पर वन में सावधानी बस विवेक होती है। पल पल पर खतरा होता है। उन्हीं खतरों का अभ्यास कराना आवश्यक लगा।

    एक सिंह की दहाड़ से कन्याएं भौचक्की रह गयीं। वैसे यह गुरुओं का ही उपक्रम था। छात्राओं के मानस से कितना भय निकला है, यही देखना था। कन्याओं की सुरक्षा के लिये गुरुओं के दो शिष्य छिपकर साथ थे। जिनका पता किसी को न था।

   वनराज बहुत पास आ गया। कुछ कन्याएं भयभीत होकर भागने लगीं। पर दोनों राजकुमारियां और उनकी एक सखी कुबला वनराज का सामना करने को उद्यत थी। वनराज के दावों को तीन कन्याएं अपनी अस्त्र निपुणता से रोक रही थीं। पर अभी कुछ कमी थी। तभी तो एक सिंह तीन अस्त्रधारी कन्याओं पर भारी पड़ रहा था।

  आखिर सिंह ने प्रभावती पर अपना पंजा मार दिया। शेष दोनों कन्याओं की आवाज जंगल में गूंजने लगी। सिंह दूसरा वार करता कि उससे पूर्व ही दो युवक सिंह से भिड़ गये। कुछ ही पलों में सिंह यमलोक पहुंच गया।

   दोनों युवको ने राजकुमारियों की तरफ देखा भी नहीं। ऐसा ही उनके गुरुओं का आदेश था। चंपकपुरी के युवाओं पर गुरुओं को इतना विश्वास था कि वे उनकी आज्ञा कभी नहीं टालेंगें। दोनों का बलिष्ठ शरीर किसी की कन्या के मन को हरने के लिये पर्याप्त थे। 

  आज पहली बार दोनों राजकुमारियां कुछ बैचेन रहीं। रात्रि स्वप्न में उन्हें वे ही युवक दिखाई दिये। मन में प्रेम का राग गूजने लगा। पर वह प्रेम किससे हुआ है, यह भी अज्ञात था। 

  अनेकों बार प्रयास करने के बाद भी राजकुमारियां उन युवकों की झलक भी न पा सकी। पर कुछ दिनों बाद फिर जब एक व्याघ्र ने विदिशा पर हमला किया तभी ऐन मौके पर विदिशा की रक्षा उनमें से ही एक युवक ने की। 

इस तरह विभिन्न आपदाओं का आगमन और उनका उन्हीं कुमारों द्वारा निस्तारण चलता रहा। जब तक कि राजकुमारियों ने अपने बलबूते एक भयानक सिंह को धराशायी न कर दिया। 

  " हर बार हमारी रक्षा करने बाले वीरों। कहाॅ हो। इस बार फिर से दर्शन दो। हम आपके दर्शनों की उत्सुक हैं।" 

  राजकुमारियों का अनुनय चलता रहा। पर वे दोनों युवक सामने नहीं आये। राजकुमारियों ने युवकों को देखा था। पर इतना नजदीक पहुंचकर भी दोनों युवकों की निगाहें हमेशा उनसे दूर रहीं। शायद इसी को मन का निग्रह करना कहते हैं। शायद इसी लिये गुरुओं ने दोनों युवकों को कन्याओं की रक्षा के लिये चुना था। 

  आज दोनों युवक सामने तो नहीं आये। पर आज पहली बार दोनों बेकाबू हो रहे थे। कन्याओं की वाणी उनके मन को मोहित करने लगी। राजकुमारियों के स्वर उनके मन में बस गये। दोनों उनके स्वर पर अपना मन खो बैठे। 

   दोनों युवक कौन हैं, किस परिवार से संबंध रखते हैं, इसका कुमारियों को कोई पता नहीं। संभव है कि वे बहुत साधारण परिवार से संबंधित हों। पर उनकी जो खूबियां राजकुमारियों को भायीं, उनमें उनका वीरोचित व्यवहार के साथ साथ उनका चंपकपुरी वासी होना प्रमुख था। चंपकपुर के युवक एकपत्नी व्रती होते हैं। चंपकपुर का निवासी साधारण युवक भी दूसरे देश के राजकुमारों से बेहतर ही है। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'