रात का समय था। आसमान में चांद तारों की महफिल जम गयी। पर लगता है कि सभी चंपकपुरी के वीरों की तरफ ही देख रहे थे। अर्जुन द्वारा रक्षित यज्ञ अश्व इस समय सुधन्वा द्वारा रक्षित था। यज्ञ की रक्षा में सुधन्वा अनेकों सैनिकों के साथ नियुक्त था। 

  कल सूर्योदय के समय ही चंपकपुरी के वीर अर्जुन की सेना का मुकाबला करेंगें। शायद सभी स्त्रियां इस समय अपने पति का साथ चाहेंगी। रण से वीरों की वापसी वैसे भी अनिश्चित होती है। सभी योद्धा अपनी बारी से अपने परिजनों से मिलने जाते और सभी को सांत्वना देकर जल्द वापस आ जाते। पूरी रात चंपकपुरी में किसी को भी नींद नहीं आयी। 

  रात्रि के अंतिम प्रहर में सुधन्वा को घर जाने का अवसर मिला। सबसे पहले वह अपनी माॅ को प्रणाम करने पहुंचा। माॅ के आशीर्वाद से बड़ी से बड़ी विपदा दूर हो जाती है। इस समय कुवला भी अपनी माॅ के ही पास थी। 

  " माॅ। मुझे आशीर्वाद दो। कल के युद्ध में मैं आपके दूध की मान रख सकूं। निश्चित मानिये माता। अर्जुन कितने भी बड़े योद्धा हों पर कल का रण तभी समाप्त होगा जब स्वयं भगवान श्री कृष्ण आ जायेंगें।" 

  वैसे तो पूरे राज्य में सभी भगवान श्री कृष्ण के अनुयायी थे। तभी तो सभी अपने प्राणों का मोह त्याग अर्जुन से भी युद्ध को तैयार हो गये थे। पर सुधन्वा की तो बात ही कुछ अलग थी। वह तो पूर्णतः भगवान पर आश्रित था। अहं का उसके मन में कोई स्थान भी न था। भक्त वही है जिसकी निष्ठा विषम परिस्थितियों में भी न डिगे। जब भगवान ही सर्वस्व छीन लें, उस समय भी भगवान को तीसरे पग धरने की जगह दे सके। 

   माता जानती थीं कि पूरी चंपकपुरी में अपनी सत्य भक्ति से भगवान श्री कृष्ण को जो बुला सकता है, वह सुधन्वा ही है। अपने भक्तों की पुकार पर भागे आने बाले वह द्वारिकाधीश किसी भी तरह सुधन्वा के प्रण को अधूरा नहीं छोड़ेंगे। 

  आज माता को अपने भक्त पुत्र पर ज्यादा ही प्रेम आ रहा था। माता ने सुधन्वा को गले लगा लिया। बहुत देर तक उसे गले से लगाये रखा। जैसे माता के अंतर्मन ने कुछ भविष्य देख लिया हो। आज ही अपने पुत्र पर सारा स्नेह लुटाना चाहती हों।

  बहुत देर बाद माता ने सुधन्वा को छोड़ा तो बहन गले से लग गयी। इस समय भले ही तीनों में से किसी की आंखों में आंसू नहीं थे पर इस दृश्य को देख रही प्रकृति ओस की बूंदों के रूप में आंसू बहाने लगी। 

    " माता। मेरे लिये उपयुक्त कर्तव्य के अनुसार मुझे आशीर्वाद दीजिये।" 

  " हाॅ पुत्र। कल तुम्हीं रण में अपने कौशल से भगवान श्री कृष्ण को बाध्य करोंगें कि वह अपने सखा अर्जुन की सहायता करने आयें। वैसे हरि शव्द का एक अर्थ अश्व है। अश्व से चंपकपुरी वासियों को क्या प्रयोजन। विश्व के नियंता, श्री हरि भगवान द्वारिकाधीश को चंपकपुरी लाने का अनुष्ठान को पूर्णता तक पहुचाने बाले बनो। "

   शायद माता की इच्छा शेष रात्रि सुधन्वा को देखते रहने की थी। पुत्र तो वैसे भी माॅ की आंखों का तारा होता है। पर दूसरा सत्य यह भी है कि पुत्र के विवाह के बाद पुत्र पर कुछ अधिकार उसकी अर्धांगिनी का भी हो जाता है। आखिर माॅ और बहन ने सुधन्वा को प्रभावती के पास भेज दिया। रात्रि का कुछ काल तो सुधन्वा को अपनी पत्नी के साथ बिताना ही चाहिये। 

  प्रभावती काफी समय से अपने पति की राह देख रही थी। पति को देखते ही उसकी आंखों में अश्रु आ गये। 

  " यह क्या। अरे तुम तो खुद वीरांगना हो। तुम्हारी आंखों में अश्रु। क्षत्राणियां तो खुद अपने पति को हसते हसते युद्ध में विदा करती हैं। आवश्यकता होने पर खुद भी अस्त्र लेकर रण भूमि में पहुंच जाती हैं। प्रिये। वैसे भी कल कोई रण थोड़े ही होगा। कल तो रण के रूप में आराध्य श्री कृष्ण की पूजा होगी। विषाद छोड़िये राजकुमारी। मुझे मुस्कराते हुए आज्ञा दीजिये। "

   सुधन्वा ने प्रभावती की आंखों से अश्रु पोंछ दिये। प्रभावती ने भी सुधन्वा के कंधे पर सर रख दिया। कुछ देर शांति छायी रही। इस शांति को तोड़ा प्रभावती की गंभीर वाणी ने। 

" स्वामी। मैं एक क्षत्रिय पिता की पुत्री हूं। एक क्षत्रिय की धर्मपत्नी हूं। खुद वीरांगना हूं। युद्ध की अनिश्चितता से मुझे कोई भय नहीं है। मैं भी यही समझती हूं कि कल का रण वास्तव में आपकी आराधना ही है। 

    स्वामी। एक भक्त की आराधना की पूर्णता उसका अपने आराध्य को प्राप्त करना ही है। पूर्णता तो भक्त और भगवान का मिलन ही है। जब भक्त भगवान में ही समा जाये। दोनों में कोई अंतर न रहे। 

  पर स्वामी। एक सत्य यह भी है कि पूर्णता तभी मिलती है जब भक्त अपने सारे कर्तव्यों को पूर्ण कर ले। मैं आपकी अर्धांगिनी हूं। आपका आध्यात्मिक हित ही मेरा हित है। 

  स्वामी। एक सत्य यह भी है कि आध्यात्म का मार्ग संसार से ही निकलता है। आपका एक सांसारिक कर्त्तव्य शेष था।आपको देखकर विश्वास हो गया कि अभी आप अपना कर्तव्य पूर्ण कर सकते हैं। इसीलिये आपको देखकर मेरी आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। "

  सुधन्वा अपनी पत्नी प्रभावती की बातों का अर्थ समझ नहीं पाये। और जब पूर्ण अर्थ समझ में आया तो किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये। प्रभावती का कथन सत्य था कि किसी नारी की पूर्णता माता बनने में है। यह बात भी सत्य थी नारी संतान के रूप में फिर से अपने पति को ही पाती है। यह बात भी सत्य ही थी कि पति से इस तरह के संबंध बनाने का पत्नी को शास्त्रीय अधिकार भी है। यह बात भी सत्य थी कि बिना सांसारिक कर्तव्य पूर्ण किये कोई भी आध्यात्मिक इच्छा पूर्ण नहीं होती। 

  फिर भगवान श्री कृष्ण का दर्शन पाना तो चंपकपुरी के हर नागरिक की इच्छा थी। सभी की इच्छा केवल एक सुधन्वा के कर्तव्यों से उदासीन होने के कारण पूर्ण न हो, यह भी कोई उचित बात नहीं। आखिर वह एक राजा का पुत्र है।जिसका कर्तव्य प्रजा का मंगल करना ही है। 

  रात्रि का कुछ समय राजकुमार सुधन्वा और प्रभावती के मध्य उस संबंध का रहा जिसमें एक नर एक नारी के गर्भ में अपना अंश स्थापित करता है। हालांकि आजकल इस बात पर कम ही लोग विश्वास करते हैं कि कोई नर एक ही बार के संपर्क से नारी को गर्भवती कर सकता है। फिर भी यही माना जाता है कि पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करने बाले नर और नारी ऐसा कर सकते हैं। 

  रात गुजर गयी। राजकुमार सुधन्वा जल्दी से स्नान कर और तैयार हो युद्ध भूमि के लिये निकल गया। और समय से पूर्व ही निर्धारित स्थल पर पहुंचने के लिये तेजी से चलने लगा। पर बार बार मार्ग में बिलंब होता गया। राजकुमार सुधन्वा पहुंचा पर सूर्योदय होने के कुछ समय बाद ही। युद्ध आरंभ होने से पूर्व ही कढाई में गर्म हो रहा तेल राजकुमार सुधन्वा की राह देख रहा था। बिना भगवान के दर्शन के यमदेव के दर्शन का योग बन गया। पर भला क्या यह संभव है कि भगवान श्री कृष्ण के परम भक्त सुधन्वा का जीवन भगवान श्री कृष्ण की इच्छा के बिना यमराज छीन सकें। क्या यह संभव है कि गज और द्रोपदी की रक्षा करने बाले भक्तबत्सल भगवान अपने भक्त सुधन्वा की रक्षा नहीं करेंगें। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'