जो अल्फ़ाज़ हम शौक में बोल जाते थे
मन के भाव जो कागज़ पर उतर आते थे
एक पहचान वो मुझको दिला जायेंगे
कभी ख्वाब में भी ये सोचा न था
जो बातें कभी दिल को दुखा जाती थीं
पाके तन्हा पलकें भिगा जाती थीं
हम उन्ही को लफ़्ज़ों में सजा पायेंगे
कभी ख्वाब में भी ये सोचा न था
अब मैं खुद में नया हौसला पाती हूँ
नए नए रूप में खुद को आज़माती हूँ
नई राहों पर सबको साथ पाएंगे
कभी ख्वाब में भी ये सोचा न था
प्रीति ताम्रकार
जबलपुर

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