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यह जो कोशिश विकास की पुरजोर है ।
लगती साजिश विनाश की है अंधी दौड़ है।
जब-जब परमाणु धमाके से कांपी है धरा,
धुंऐं के संग जहर घुलता हवा में चहुंओर है ।
यहां रोटी मयस्सर नहीं भूखों के लिए ,
वहां भी हथियारों की कैसी मची होड़ है।
बैठे हैं बारूद के ढेर पर मानवता के लिए,
कैसा यह शांति का झूठा मचा शोर है ।
......✍️ पिंकी मिश्रा

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