हम सभी जिंदगी के जाम में फँसे हुए है,
सुबह से लेकर शाम तक सिर्फ पैसा कमाने में उलझे हुए है।
अतीत के ख्यालों से उबर नही पाते है,
की भविष्य की चिंता फांस लेती है।
अतीत और भविष्य में उलझे हुए हम,
अपना वर्तमान खो रहे है।
माता-पिता की बात सुनने का टाइम नही है,
पत्नी और बच्चों के साथ भी कहाँ सुकूँ के पल बिता पाते है।
जिंदगी के सत्य को सब जानते हुए भी अनजान है,
एक ही बात बताई है सबने फिर चाहे वो गीता हो या कुरान है।
दुनिया को मुट्ठी में करने वाले सिकन्दर को भी एक दिन जाना पड़ा था,
खुल गया था जिंदगी का उसका जाम जहां वो उलझ पड़ा था।
न कुछ लेके छये जगत में न कुछ लेके जाना है,
खाली हाथ ही आये थे खाली हाथ ही जाना है।
चार दिन की जिंदगी हँस खेल कर बिताना है,
जिंदगी के जाम से बाहर निकल ये मानव
एक रोज सबको जाना है।
जद्दोजहद नभरी इस जिंदगी में
कुछ पल अपने लिए अपनों के लिए भी निकाल,
निकल जा मुसीबतों के जाम से बाहर
और अपना भूत, भविष्य और वर्तमान सम्हाल।।
शीला द्विवेदी "अक्षरा"

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