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नयन नीर भरी दुख बरसा जाए ,
मोती बनकर आंसू पाणि भिगाए !

अंतस की पीड़ा अंतस को भेदे ,
धीरे-धीरे हृदय में हुक उठाए !

कैसे बताऊं सखि भेद  मन का,
मन बंजारा बैरी ,तन रोग लगाए !

सुख के संग आए अपने कितने ,
दुख तेरे आते ही सब हुए पराए !

उलझी-उलझी डोर जीवन की ,
लाख जतन करूं सुलझ न पाए !

.......✍️ पिंकी मिश्रा
भागलपुर बिहार ।